Friday, February 10, 2017

संगमनकार में दो नए कॉलम----

http://sangamankar.com/
हमारी वेबसाइय संगमनकार में दो नए कॉलम----

1 प्रियंवद का कॉलम “आइनाघर ” -----
इस कॉलम में विगत वर्षों में उनके द्वारा लिखी गई रम्य रचनाएं और प्रमुख हस्तियों से साक्षात्कार पुनः प्रकाशित किए जायेंगे ।
ये क़ॉलम प्रतिमाह पहले व तीसरे हफ्ते में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जायेगा ।
2 यायावर
इसमें हर बार एक नई रचना पोस्ट की जाएगी । यह साहित्य की यायावरी है। कभी कविता, कभी कहानी, कोई गीत, गज़ल, नज्म या कोई रम्य रचना पोस्ट की जायेंगी।
आप अपनी रचनाएं हमें sangamankar@gmail.com पर मेल कर सकते हैं ।
ये क़ॉलम प्रतिमाह दूसरे एवं चौथे हफ्ते में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जायेगा।


आप हमारी साइट पर इन दोनो कॉलम को पढ़ सकते हैं

जीवेश प्रभाकर
संपादक, संगमनकार

Wednesday, January 18, 2017

विकल्प विमर्श मुक्तिबोध शताब्दी स्मरण श्रृंखला -4----


इस बार कविता ----
  मुझे कदम कदम पर
      (
मुक्तिबोध )
मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए !!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने...
सब सच्चे लगते हैं;
अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है
मैं कुछ गहरे मे उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए !!
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य-पीड़ा है,
पल-भर मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,
इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है जिंदगी !!
बेवकूफ बनने की खतिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ;
और यह देख-देख बड़ा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है
कि जगत्... स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियाँ लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहाँ जरा खड़े होकर
बातें कुछ करता हूँ...
...
उपन्यास मिल जाते।
दुःख की कथाएँ, तरह तरह की शिकायतें,
अहंकार विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
जमाने के जानदार सूरे व आयतें
सुनने को मिलती हैं।
कविताएँ मुसकरा लाग-डाँट करती हैं
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ
श्रद्धाएँ चढ़ती हैं !!
घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप-चित्र
लेकर मैं घर पर जब लौटता...
उपमाएँ द्वार पर आते ही कहती हैं कि
सौ बरस और तुम्हें
जीना ही चाहिए।
घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,
बाँहे फैलाए रोज मिलती हैं सौ राहें,
शाखाएँ-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं
नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय
रोज-रोज मिलते हैं...
और, मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है
और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है !!
-
मुक्तिबोध-
(प्रस्तुति -जीवेश प्रभाकर)