Tuesday, January 19, 2016

ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर...... बयादे रोहित वेमुला (=जीवेश प्रभाकर= )

ये दाग दाग उजाला , ये शब-गज़ीदा सहर

वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं...
फैज़ साहब की रचना लगातार मस्तिष्क में गूंज रही है । आज, आजादी के  70 साल बाद भी, हैदराबाद में एक युवा छात्र ,रोहित वेमुला, विश्वविद्यालयीन कुशासन,प्रशासनिक अक्षमता  अकर्मण्यता और लाल फीताशाही से कहीं ज्यादा छद्म राष्ट्रवादियों एवं मनुवादियों के जुल्म व अत्याचार से तंग आकर आत्महत्या कर लेता है । यदि आज भी ऐसे वाकयात सामने आ रहे हैं तो निश्चित रूप से हम सब के लिए शर्म की बात है। इस दर्दनाक घटना से सभी वाकिफ व आहत हैं । दुखदायी बात यह है कि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर है ।  
    
जाने कब समाज को बदल डालने की तमन्ना लिए एक युवा अचानक मानो हमारे मुंह पर थूकता हुआ दूसरे जहाँ को चला जाता है । मानो कह रहा हो कि तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया । मगर हम हैं कि शर्म भी आती नहीं । आज राष्ट्रवाद नहीं पूरे राष्ट्रीय मूल्य सवालों के घेरे में हैं । रचनात्मकता से पूर्ण, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता,राजनैतिक जागरूकता और जुझारूपन ही शायद उसका सबसे बड़ा अपराध हो गया ।
रोहित वेमुला की आत्महत्या  दरअसल वह एक पूरे समाज का अवसान है , तथाकथित सभ्य, सुसंस्कृत व शिक्षित समाज का । स्वघोषित भद्रजनो के बीच एक उत्साही और ऊर्जावान युवा अचानक खुदकुशी कर ले तो यह उस युवक से ज्यादा पूरे बौद्धिक समाज का मर जाना है । शर्म हमको आती नहीं मगर हम जिंदा हैं । हम सब सवालों के दायरे में हैं और जवाब कोई दे नहीं रहा या कोई देना ही नहीं चाहता । हम सब एक सधी बधी चुप्पी के साथ छद्म बौद्धिकता का लबादा ओढ़े झूठी सहानुभूति उडेले दे रहे हैं । ऐसे समाज का पतन निश्चित है ।यह पूरे बौद्धिक वर्ग का  पतन व क्षरण है । पतन इसलिए भी कि पूरा बौद्धिक वर्ग कभी भी उस युवा के साथ खड़ा दिखाई नहीं दिया, न उस विश्वविद्यालय का और न ही अन्य कहीं का। कुछ समय तक छात्रावास के कुछ साथी रोहित के साथ खड़े रहे मगर इन जुझारू नौजवानो को किसी और का संग साथ नहीं मिल सका ।
प्रश्न तो दलित समुदाय के उन नवधनाड्य व उच्चपदेन वर्ग से भी होगा जो सुख सुविधा भोगते आज शोषण में  उसी मनुवादियों के साथ खुद भी एक इलीट क्लास बना बैठे हैं । प्रश्न दलित आंदोलनो के उन पैरोकारों से भी होगा कि वे आखिर क्यों रोहित और उसके साथियों के संघर्ष में पूरी शिद्दत के साथ शामिल नहीं हो सके । विश्वविद्याल. मे पदस्थ समस्त बौद्धिक वर्ग आखिर क्यों इस मामले को सुलझाने आगे नहीं आ सका? आखिर मौन की क्या वजह रही होगी ?
दूसरी ओर समाज का एक तबका एक षड़यंत्र के तहत इस शर्मनाक व दर्दनाक हकीकत को  राजनैतिक दांवपेंचों में उलझाकर इसे एक हताशा, अवसाद की परिणीति साबित करने पर तुला हुआ है । संभव है धनबल व छल से कानूनी गुत्थियो का फायदा उठाकर रोहित के आरोपी बच निकलें । इधर इसे दलित समुदाय तक सीमित कर देने का घिनौना षड़यंत्र भी शुरु कर दिया गया है सिर्फ इसलिए कि रोहित अम्बेडकर स्टुडेंट फोरम का सदस्य था ?  मगर यह महज दलित समुदाय का मुद्दा नहीं है । वह एक शोध छात्र था और वह एक आम छात्र की तरह कैरियरजीवी नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय कैम्पस में बौद्धिक हस्तक्षेप के साथ अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और बदलाव की ऊर्जा लिए राष्ट्र के एक जागरूक युवा के रूप में रोजाना हाजिरी देता दिखाई पड़ता था। और निश्चित रूप से यही उन सबकी आंखों की किरकिरी हो गया था । उनकी , जो सार्वभौमिक सत्ता की चाह में समाज को एक बार फिर जातिवाद और नस्लवाद के घृणित दायरे में कैद कर देना चाहते हैं एक दकियानूसी और बौद्धिक कृपण समाज में प्रगतिशील मूल्यों का यही एक हश्र हो सकता है । आज अगर खामोश रहे तो न जाने ऐसे कितने रोहित रोज मरेंगे और दफ्न कर दिए जायेंगे , इतने गहरे कि आप चाहकर भी उसकी थाह न पा सकें ।
       युवा उद्वेलित हैं । नई सदी के इस पूर्वार्ध में युवाशक्ति जबरदस्त उहापोह और बेचैनी के दौर से गुजर रही है । आज देश एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है । बहुत से युवा इसे महसूस कर रहे हैं और लगातार संघर्ष कर रहे हैं । हालांकि वे पूरी तरह संगठित नहीं हैं मगर बदलाव के लिए जूझ रहे हैं ।  दुख इस बात का है उन्हें कोई दिशा देने वाला और साथ खड़े हने वाला कोई नहीं है जिसके अभाव में आंदोलन बिखरा बिखरा सा हो रहा है ।तकलीफ ये भी है मुट्ठीभर कट्टरपंथियों के आगे पूरा बौद्धिक वर्ग नतमस्तक सा है और इनके साथ आने में झिझक रहा है ।एक उम्मीद इन्ही नौजवानों से है जो अलग अलग मोर्चों पर अपने तई एक कोशिश कर रहे है , उम्मीद इन्ही विश्वविद्यालयों के नौजवान छात्रों से है ,हम बस उनका साथ दे लें तो तस्वीर काफी बदल सकती है ।ज़रूरी है कि इसके लिए हमें अपने सुरक्षित खोल से ज़रा बाहर निकलकर सामने आयें ।
ये वो सहर तो नहीं जिस की आरजू लेकर
चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों कि आखरी मंजिल
कहीं तो होगा शब-ऐ-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जा के रुकेगा सफीना-ऐ-गम-ऐ-दिल.....( फैज़)

(जीवेश प्रभाकर, रायपुर)


Tuesday, October 13, 2015

सांस्कृतिक सत्याग्रह है यह रचनाकारों का फासिस्म के खिलाफ

संकट सचमुच गंभीर और बड़ा ही है ।बड़े बड़े विद्वान रचनाकार , जो मेरे पसंदीदा रचनाकारों में शुमार रहे हैं, अपने सम्मान और पुरस्कार लौटा रहे हैं। मुझ जैसै थोड़ा बहुत पढ़ने वाले भी अब इसे महसूस करने लगे हैं । 

एक लोकतांत्रिक प्रणाली में , जो शायद अभी थोड़ी बहुत बाकी है , बौद्धिक प्रतिरोध का यह एक बेहतरीन तरीका है । इसे सांस्कृतिक सत्याग्रह कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । विरोध का स्वप्रेरित निजि औजार , जिसे गांधी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह का नाम दिया था । आज इस दौर में रचनाकार इसे बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं । 
फासिस्म के बढ़ते खतरों के खिलाफ इस बड़ी तादात में रचनाकारों का विरोध स्वरूप राष्ट्रीय पुरस्कार व सम्मान लौटाने की पहल संभवतः भारत के इतिहास में पहली बार सामने आ रही है । मैं इतिहास उतना नहीं जानता मगर संभवतः आपातकाल में भी ऐसी बेचैनी और खिलाफत नहीं देखी गई ।
हालांकि एक मंत्री ने इस पर भी सवाल उठाते हुए इसे सुनियोजित षड़यंत्र करार देने की कोशिश की है जो उनकी व उनकी पार्टी की बौखलाहट को प्रदर्शित करती है । मगर निश्चित रूप से ये तमाम पूर्वाग्रहों दुराग्रहों से इतर चेतन मस्तिष्क से लिया गया एक विवेकपूर्ण व साहसिक फैसला है जो भीतरी करंट की तरह सभी बुद्धिजीवीयों में पिछले काफी समय से कुलबुला रहा था जो उदय प्रकाश जी ( कम से कम हिन्दी में तो ) की एक चिंगारी से फट पड़ा । ज़रूरत इस बात की है कि ये जज्बा बरकरार रहे । कुछ विघ्नसंतोषी और विध्वंसक तत्व भी हैं इसी जमात में जो भावनाओं और अहं भड़काकर या अलग अलग तरीकों से इस मुहिम को नेस्तनाबूद करने में लगे हैं । आप लोगों को इससे सावधान रहना होगा। 
कुछ लोग जो हिन्दी लेखकों को कमतर और उनकी जनस्वीकृति को न्यूनतम आंकते हैं वे अभी इसे बहुत हल्के में ले रहे हैं मगर इसका असर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होगा । एक सुखद आश्चर्य की बात ये है कि हाल के दिनों में पाठक वर्ग , बहुत छोटा ही सही , भी रचनाकारों के इस प्रतिरोध में खुद को शामिल समझने लगा है । हालांकि उसके पास अभिव्यक्ति का कोई सशक्त माध्यम नहीं है मगर आपस में रचनाकारों के इस प्रतिरोध की चर्चा होना ही अपने आप में समर्थन का परिचायक है और साथ साथ एक सकारात्मक बदलाव का प्रतीक भी होता जा रहा है
बकौल साहिर बस इतना ही कह सकते हैं...
ले दे के अपने पास,
फकत इक नज़र तो है
क्यों देखें ज़िंदगी को
किसी की नज़र से हम


जीवेश प्रभाकर