Monday, June 19, 2017

मुक्तिबोध ः पत्रकारिता के प्रगतिशील प्रतिमान -जीवेश प्रभाकर

गजानन माधव मुक्तिबोध का यह जन्म शताब्दी वर्ष है । पिछली आधी सदी
से हिन्दी साहित्य मे मुक्तिबोध की गंभीर उपस्थिति एक  गहन बौद्धिक आवरण की तरह छाई हुई है । मुक्तिबोध एक चिंतनशील व जागरूक रचनाधर्मी के रूप में जाने जाते हैं । वे  गहन मानवीय संवेदना के कवि तथा कल्पनाशील कथाकार तो हैं ही साथ ही स्पष्टवादी समीक्षक के रूप में भी जाने जाते हैं । कविता कहानी व समीक्षा के अलावा इतिहास व अन्य विषयों पर भी उनका प्रचुर लेखन रहा है । एक बात जो उनके संदर्भ में ज्यादा प्रकाश में नहीं लाई जाती वो है उनका पत्रकार के रूप में लिखा गया महत्वपूर्ण गद्य । हालांकि मुक्तिबोध ने अपनी दीगर रचनाओं के मुकाबले अखबारी लेखन कम ही किया है मगर एक छोटे अंतराल में ही सही उन्होंने अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाते हुए जो लिखा वो उन्हें बेबाक, अध्ययनशील व जागरूक पत्रकार के रूप में स्थापिक करता है साथ ही उच्चस्तरीय पत्रकारिता की एक मिसाल कायम करता है जिसे आज भी छू पाना बहुत मुश्किल है। इस तरह साहित्य व पत्रकारिता दोनो के शीर्ष प्रतिमानो का एक साथ मिल पाना दुर्लभ संयोग ही कहा जा सकता है । यह बात गौर तलब है कि जो मुक्तिबोध अपनी रचनाओं में दुरूह  व क्लिष्ट समझे जाते हैं वही अखबारों में बहुत ही सीधी व सरल  भाषा में अपनी बात कहते हैं जो आसानी से संप्रेषित होती है । अक्सर बुद्धिजीवी उनके साहित्यिक गूढ़ता के आलोक में उनकी इस सीधी सरल भाषा एवं जानकारीपूर्ण  व तथ्यात्मक आलेखों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं । ‘’मुक्तिबोध रचनावली’’ के छठे खंड  में  मुक्तिबोध के अखबारी लेखन को शामिल किया गया है । इसके अलावा उनके पुत्र  रमेश मुक्तिबोध ने अपने पिता की सामग्री खोज कर  उसे ‘’जब प्रश्नचिन्ह बौखला उठे’’ शीर्षक से ‘’रचनावली’’ काफी वर्षों बाद एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में  प्रकाशित करवाया है ।
मुक्तिबोध की पत्रकारिता आज़ादी के बाद और मुख्य रूप से पहले आम चुनाव 1952 के आसपास ही शुरू होती है । इसके पूर्व वे एक पत्रकार के रूप मे कम ही सक्रिय रहे। मुक्तिबोध नया खूनके सम्पादक रहे इसके अलावा  वे नागपुर से ही प्रकाशित सारथीके साथ भी जुड़े रहे । माना जाता है कि मुक्तिबोध ने छद्म नामो से भी अनेक लेख लिखे । आजादी के पश्चात देश अनेक कठिनाइयों से गुज़र रहा था । एक ओर विभाजन की त्रासदी थी तो दूसरी ओर देश आर्थिक मोर्चे पर भी अनेक कठिनाइयों से जूझ रहा था । ऐसी परिस्थितियों के बावजूद नव स्वतंत्र देश के स्वप्न भी आकांक्षाओं के पंख फैलाए नए फलक पर छा जाने को आतुर थे । राष्ट्रीय नेताओं में तब सबसे युवा, लोकप्रिय व ऊर्जावान नेता पं. जवाहर लाल नेहरू देश की बागडोर संभाल चुके थे । आजादी की मध्य रात्रि को दिए गए उनके ओजस्वी भाषण से देश में एक नई ऊर्जा व उत्साह का संचार हुआ, विशेष रूप से युवाओं को पं. नेहरू से काफी उम्मीदें जगी थीं । देश के युवा वर्ग में पं. नेहरू के करिश्माई व्यक्तितव का जादू चरम पर था और इससे मुक्तिबोध भी अछूते नहीं रह पाए थे । संभवतः पं. नेहरू के समाजवादी रुझान एवं नास्तिकता की हद तक धर्मनिरपेक्ष रुख प्रमुख कारण रहा हो , यहां तक कि पं. नेहरू की मुत्यु पर तो मुक्तिबोध ने स्पष्ट रूप से यह घोषित कर दिया था कि अब फासिज्म को देश में पैर पसारने से कोई रोक नहीं सकता और आज हम उनकी आशंकाओं को फलीभूत होते देख ही रहे हैं । यह बात भी गौरतलब है कि नेहरू के अवसान, 27 मई 1964, के बमुश्किल 6 महीने के अंतराल में, 13 सितंबर 1964, मुक्तिबोध का भी निधन हो गया।
 अपने अखबारी लेखन के छोटे मगर महत्वपूर्ण कालखंड में मुक्तिबोध नवस्वतंत्र भारत के पुनर्रुत्थान में  नेहरू की भूमिका को लेकर काफी उत्साहित व आशान्वित थे ऐसा उनके लेखों में साफ झलकता है । पं. नेहरू के नेतृत्व में आजाद भारत के विकास को लेकर भी मुक्तिबोध को पं. नेहरू से काफी आशाएं थी । हालांकि  आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही पूरे देश में स्वप्नभंग व निराशा का दौर शुरु हो चुका था, जो  मुक्तिबोध की दीगर रचनाओं में भी झलकने लगा था, मगर एसके बावजूद उनके मन के एक कोने में नेहरू के प्रति अंत तक एक नरम व आशावादी रुख बना रहा। दून घाटी में नेहरू, नेहरू की जर्मन यात्रा का महत्व, तटत्थ देशों को ज़बरदस्त मौका, जैसे लेखों में मुक्तिबोध की पं. नेहरू के प्रति आसक्ति को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है । उनका लेखन मुख्यतः नेहरू-युग के उतार चढ़ाव के दौर में विश्व-राजनीति में भारत की भूमिका ,तटस्थ देशों एवं साम्यवादी देशों की भूमिका, अमेरिकी-सोवियत शीत-युद्ध और इन सब के बीच नव-स्वतंत्र भारत की विकासशील छवि को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्थिति एवं इसमें पं. नेहरू की सूझबूझ भरी दूरदृष्टि पर केन्द्रित  कही जा सकती है । इन लेखों में मुक्तिबोध के साम्यवादी प्रगतिशील विचारों की स्पष्टता एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसे आज भी पढ़ा जाना चाहिए ।  
अंतर्राष्ट्रीय  हालात और संबंधों की जो समझ मुक्तिबोध में तब थी आज भी वैसी समझ व दृष्टिकोण  का कोई पत्रकार नज़र नहीं आता है । प्रगतिशील साहित्यकारों में भी इस तरह साहित्य से इतर मसलों व परिस्थितियों पर जागरुकता का घोर अभाव रहा है । आजादी के पश्चात प्रगतिशील रचनाकारों में  मुक्तिबोध के अलावा हरिशंकर परसाई ऐसे रचनाकार रहे जिन्होने मुक्तिबोध की तरह स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों का गहन अधययन मनन कर लगातार लेखन किया । यह बात गौरतलब है कि जहां मुक्तिबोध तमाम विषयों पर गंभीर लेखन करते रहे वहीं परसाई ने व्यंग्य के माध्यम से लगभग आधी सदी तक  लोक शिक्षण का काम किया मगर दोनो के ही लेखन में प्रचुर अध्ययन, सूक्ष्म अवलोकन व स्पष्ट रूप से साम्यवादी प्रगतिशील मानवीय दृष्टिकोण समान रूप से मौजूद रहा है । इस संदर्भ में एक बात और गौर करने लायक है कि जहां परसाई प्रारंभ से ही नेहरू की नीतियों की निष्पक्ष समीक्षा धरातल पर आकर करते रहे वहीं मुक्तिबोध की नेहरू के प्रति आसक्ति को उनके लेखन से समझा जा सकता है ।
एक पत्रकार के रूप में उन्होने राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों एवं तात्कालीन वैश्विक परिदृष्य पर पूरे अध्ययन व गंभीर चिंतन के साथ तर्कपूर्ण आलेख लिखे । इससे उनकी वैश्विक समझ व प्रगतिशील दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है । छठवें दशक में वे एक सजग व जागरूक पत्रकार के रूप में न सिर्फ देश के अंदरूनी हालातों पर वरन यूरोप व अमेरिका सहित पूरे विश्व से संबंधित समस्त मसलों पर अपने आलेखों के माध्यम से वे लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे । यह बात ग़ौरतलब है कि आज एक बार फिर यूरोप व अमरीका जबरदस्त अंतर्विरोध व संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और दश्रिणपंथी ताकतें फिर सर उठा रही हैं मगर कम से कम हमारे देश के अखबारों या मीडिया में इसे लेकर महज सूचनाओं के और  कोई गंभीर आलेख पढ़ने को नहीं मिल रहे हैं । हाल में संपन्न फ्रांस के चुनावों पर पूरे विश्व की निगाहें थी । गौरतलब है कि लगभग साठ वर्ष पूर्व फ्रांस किस ओर आलेख में मुक्तिबोध ने द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात फ्रांस के बहाने पूरे यूरोप की तत्कालीन परिस्थितियों पर अमरीकी पूंजी निवेश के दुष्परिणामों का उल्लेख करते हुए भविष्य के खतरों की ओर इशारा किया था । आज ऐसे विश्लेषणात्मक लेख का सख्त अभाव पूरे प्रकारिता जगत में देखा जा सकता है । लगभग 60 वर्ष पूर्व वे विश्व में तेजी से बढ़ती अमरीका के दखल व पूंजीवादी ताकतों के साम्राज्यवादी मंसूबों पर वे लगातार सचेत होकर लिखते रहे । अंग्रेज गए मगर इतनी अंग्रेजी पूंजी क्यों, समाजवादी समाज या अमरीकी ब्रिटिश पूंजी की बाढ़, तथा अन्य लेखों में वैश्विक स्तर पर बढ़ते पूंजीवादी खतरों व अमरीकी प्रभाव के प्रति लगातार इशारा करते रहे ।
 हालांकि मुक्तिबोध कभी राजनैतिक एक्टिविस्ट नहीं रहे और न किसी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग ही लिया मगर मुक्तिबोध के पास एक गहरी राजनैतिक व सामाजिक दृष्टि के साथ ही आर्थिक मामलों की समझ, सूक्ष्म व चौकस अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि तथा गहन व विस्तृत अध्ययन था। ऐसा विलक्षण संयोग आज भी मिल पाना कठिन है । उन्होने दिग्विजय कॉलेज के कार्यकाल के दौरान एक आयोजन में अपने उद्बोधन में कहा था कि कोई भी घटना क्यों घटती है पत्रकार को उसके मूल कारणों को समझना जरूरी है, आधुनिक राजनीति में जनमत का महत्वपूर्ण है तथा जनमत के मूलाधार के बिना किसी भी देश में न तानाशाही कायम रह सकती है न लोकतंत्र ।  एक बात स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि मुक्तिबोध साम्यवाद के प्रति पूरी तरह समर्पित थे । देश व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  साम्यवाद व साम्यवादी देशों की मुश्किलों के प्रति उनकी चिंता उनके अनेक लेखों में देखी जा सकती है । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूंजी व पूंजीवादी देश अमरीका के बढ़ते प्रभाव तथा तत्कालीन साम्यवादी ताकतवर देश सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध के वैश्विक परिणामों व हलचलों पर वे पैनी दृष्टि रखते थे । पश्चिम एशिया में अमरीका की दिलचस्पी, साम्यवादी राष्ट्रों की नई समस्या, साम्यवादी समाज या अमरीका, कम्युनिज्म का संक्रमणकाल,समाजवाद का निर्माण जैसे आलेखों के माध्यम से वे लगातार अपनी चिंता जाहिर करते रहे ।
राजनैतिक लेखों के अलावा मुक्तिबोध सामाजिक व सांस्कृतिक फलक पर भी लगातार सक्रिय रहे । वे देश की सांस्कृतिक विरासत के  सजग प्रहरी के रूप में संस्कृति पर बढ़ते फासिस्ट खतरों से अनजान नहीं थे बल्कि लगातार उस पर लिख रहे थे । सांस्कृतिक आध्यात्मिक जीवन पर संकट, दीपमलिका,हुएनसांग की डायरी,भारतीय जीवन के कुछ विशेष पहलू आदि लेख आज भी अपनी उपयोगिता पर खरे उतरते हैं । संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के दौरान उनके द्वारा लिखित संयुक्त महाराष्ट्र का निर्माण एकदम ज़रूरी’’  सम्पादकीय में मुक्तिबोध स्वायत्त महाराष्ट्र राज्य की  पैरवी करते हैं और इसे एक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दस्तावेज़ बना देते  हैं । वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हैं कि महाराष्ट्र प्रांत के लिए आन्दोलन अलगाववादी नहीं  बल्कि वह भारतीय संस्कृति और महत्वाकांक्षा का ही एक वेगवान रूप है । अपने संपादकीय में वे एकीकृत संयुक्त महाराष्ट्र के पक्ष में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि सभी पहलू शामिल करते हैं । इस तरह के संपादकीय की कल्पना आज कर पाना संभव नहीं है और पूर्व में भी कहीं नजर में नहीं आता है । इसके साथ साथ वे आधुनिक भारतीय समाज, युवा वर्ग, धर्म अवं अन्य संसामयिक विषयों पर भी लगातार अपने विचार व्यक्त करते रहे । आधुनिक समाज का धर्म, भारतीय जीवन के कुछ विशेष पहलू,नौजवान का रास्ता,ज़िन्दगी के नए तकाजे और सामाजिक त्यौहार जैसे आलेखों में उनकी चिंताओं पर उनके प्रगतिशील विचारों को समझा जा सकता है । भाषा को लेकर वे अत्यंत संवेदनशील थे ये उनकी हर रचना में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, मगर हिन्दी के सरकारीकरण की विडंबनाओं पर उनका लेख अंग्रेजी जूते में हिन्दी को फिट करने वाले भाषाई रहनुमा बहुत महत्वपूर्ण व व्यवहारिक है ।
अपने रचनाकाल के छोटे कालखंड में मुक्तिबोध द्वारा की गई पत्रकारिता के दौरान अखबारों में किए गए लेखन को बाद में लगातार हाशिए पर ही रखा गया । इसका एक कारण संभवतः ये हो सकता है कि मुक्तिबोध का सारा लेखन  उनकी मृत्यु पश्चात ही प्रकाशित हो पाया और उन्हें मृत्यु पश्चात ही ज्यादा लोकप्रियता मिली। उस दौर में ग़ैरसाहित्यिक लेखन को हल्का, निम्नस्तरीय समझा जाता रहा और अखबारी लेखन कहकर उपहास भी उड़ाया जाता रहा । इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि साहित्य जगत में उनकी कविताओं व गद्य पर ही सारा ध्यान केन्द्रित कर दिया गया,हालांकि बदलते परिवेश में आज सभी अखबार व अन्य मीडिया की ताकत के सामने नतमस्तक हैं और इनमें छपने लालायित रहते हैं । मुक्तिबोध के अनुसार बहुत से कवियों के अन्तःकरण में जो बेचैनी , जो ग्लानि, जो अवसाद, जो विरक्ति है, उसका एक कारण उनमें एक ऐसी विश्व दृष्टि का अभाव है जो उन्हें आभ्यन्तर आत्मिक शक्ति प्रदान कर सके, उन्हें मनोबल दे सके, और उनकी पीड़ाग्रस्त अगतिकता को दूर कर सके । कवियों से ऐसी विश्वदृष्टि अपेक्षित है जो भावदृष्टि का, भावना का, भावात्मक जीवन का अनुशासन कर सके ...। आज उनकी इस बात पर गौर करना ज़रूरी है । रचनाकारों को , विशेष रूप से प्रगतिशील जनवादी रचनाकारों को, इस ओर ध्यान देना चाहिए । मुक्तिबोध के अखबारी लेखन के प्रचार प्रसार एवं  पुनर्पाठ की सख़्त ज़रूरत है । उनके अखबारी लेखन में भी उनकी विचारधारा कहीं समझौते नहीं करती बल्कि पत्रकारिता को नए आयाम देती है और पत्रकारिता के प्रगतिशील प्रतिमान स्थापित करती है । मुक्तिबोध की सुप्रसिद्ध कविता अंधेरे में के अंश  है-
इसलिए मैं हर गली मे
और हर सड़क पर
झांक झांक देखता हूं हर एक चेहरा
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र
व हर एक आत्मा  का इतिहास
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया क्रियागत परिणति
खोजता हूं पठार...पहाड़...समुंदर
जहां मिल सके मुझे
मेरी वह खोई हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म- संभव ।

-जीवेश प्रभाकर-
कथाकार एवं उप-संपादक अकार
Mob,- 9425506574

Email: jeeveshprabhakar@gmail.com

Tuesday, March 28, 2017

आइनाघर-5 -- सतह से उठता हुआ गांधी : प्रियंवद


http://sangamankar.com/
आइनाघर-5
हमने अपनी वेबसाइट में वरिष्ठ साहित्यकार व अकार के संपादक प्रियंवद का कॉलम “आइनाघर ” शुरु किया है जो पाक्षिक हैपहले व तीसरे हफ्ते में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है।इस बार...

आइनाघर-5
सतह से उठता हुआ गांधी
संदर्भ : 'पहला गिरमिटिया' उपन्यास का गांधी : प्रियंवद
 .......गिरिराज किशोर का उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’, हमें इस बात का एक मौका देता है कि इस खत्म होती हुयी सदी में, लगभग निर्विवाद और सर्वमान्य, शताब्दी या सहस्त्राब्दी पुरुष की प्रासंगिकता और भूमिका के बारे में हम एक बार फिर सोचें। यह उपन्यास हमें गांधाी के पुनर्मूल्यांकन का भी एक अवसर देता है। लोहिया के शब्दों में अगर कहें तो गांधी के बारे में ‘पैगम्बर या ढोंगी’और ‘देश का वरदान या अभिशाप’जैसे विवाद को भी यह उपन्यास पुनर्जीवित करता है। यह पूनर्मूल्यांकन इसलिए जरूरी है क्योंकि अतीत में गांधाी की भूमिका और वर्तमान में प्रासंगिकता, आज भी पूरी तरह बहस में है। दो सदियों के इस संधि बिन्दु पर, गांधी को चुके हुए या अधिक क्रूर शब्दों में कहें तो उसको एक सड़े गले सन्दर्भ की तरह छोड़ देना है या अपनी अंतिम शरण की तरह पकड़ लेना है..... यह बहस अभी शेष है। 'पहला गिरमिटिया' का सर्वप्रथम महत्व और संदर्भ यही है कि वह इस बहस को जीवित रखता है। ..... (प्रियंवद)
 
जीवेश प्रभाकर
संपादक, संगमनकार

Monday, February 20, 2017

आइनाघर-4 में “बुत हमको कहें कांफिर ”

संगमनकार में – प्रियंवद का “आइनाघर ”   

आइनाघर-4 में “बुत हमको कहें कांफिर ”
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हमने अपनी वेबसाइट में वरिष्ठ साहित्यकार व अकार के संपादक प्रियंवद का कॉलम “आइनाघर ” शुरु किया है जो पाक्षिक है और प्रतिमाह के पहले व तीसरे हफ्ते में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है।
आइनाघर-4 में
इस बार आइनाघर-4 में “बुत हमको कहें कांफिर ”
गंगा- जमुनी संस्कृति व सामाजिक ताने बाने पर लिखी यह रचना आज के माहौल में अत्यंत ही प्रासंगिक है ।
जीवेश प्रभाकर
संपादक- संगमनकार
बुत हमको कहें काफ़िर....... :प्रियंवद
.......' शाखा ' की ही एक और घटना हुयी। राजेश्वर कृष्णन हमारा दक्षिण भारतीय मित्र है।उसकी माँ निष्ठावान हिन्दू थी । 'शाखा' में तय हुआ कि शरद पूर्णिमा के अगले दिन सबको चांदनी में रखी खीर खिलाई जाएगी। राजेश्वर ने अपनी माँ को बताया कि वह शाम को खीर खाने शाखा जाएगा ।
'वहाँ गए तो टाँगें तोड़ दूँगी' माँ ने कहा था ।
वह बताता है मैंने माँ से बहस की कि क्या बुराई है ? प्रसाद की खीर है । प्रसाद तो घर में, मन्दिरों में सब जगह खाते हैं । फिर वहाँ खेल भी होगें । पर उसका एक ही उत्तर था 'नहीं जाना है।'
राजेश्वर की पत्नी अंग्रेज़ है । बहुत साल लखनऊ में रही है । आज राजेश्वर को अपनी माँ की बात समझ में आती है । खासतौर से तब जब उसकी पत्नी लखनऊ की सड़कों पर निकलती है । बाद में बच्चों के बड़े होने पर वह इंग्लैंड चला गया । उसके बच्चे शक्ल से अंग्रेज लगते है । बहुत अच्छी हिन्दी बोलते हैं । बेटी का नाम रोहिणी है । वे भी साल में एक बार लखनऊ आते हैं । पत्नी आती रहती है । शायद वे सब न डरते हों, पर उनके साथ होने पर राजेश्वर डरता है । ट्रेन में, सड़कों पर, भीड़ में ,मेलों में, जुलूस में, उसी तरह जिस तरह तमिलों द्वारा राजीव गाँधी की हत्या के बाद उसे सलाह दी गयी थी की कि घर के बाहर 'डॉ. कृष्णन' की नेम प्लेट हटा ले, क्योंकि 1984 में इंदरा गाँधी की हत्या के बाद सिक्खों के साथ जो हुआ, सबने देखा था। उसने भी कानपुर में देखा था । तब कानपुर में 72 सिक्खों की हत्या हुई थी और दिल्ली के बाद सिक्खों की हत्या करने के मामले में दूसरा शहर कानपुर था। वह उसी तरह डरता है जिस तरह बाबरी मस्जिद गिरने के बाद डरा था, और जो मुसलमानों के साथ हुआ था और जिसे उसने देखा था । वह उसी तरह डरता है, जिस तरह उड़ीसा में ग्राहम स्टेन्स को जलाने और चर्च फूँके जाने के बाद डरा था । 'नस्ल की श्रेष्ठता', 'धर्म की उच्चता' 'विशिष्ट होने का बोध' 'अन्य से घृणा' 'सांस्कृतिक गौरव' 'राष्ट्रवादी उन्माद', धर्म-शक्ति का प्रदर्शन कर्मकांड सब उसे डराते हैं, किसी भी धर्म, देश, जाति के हों । .....
(प्रियंवद) 

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Friday, February 10, 2017

संगमनकार में दो नए कॉलम----

http://sangamankar.com/
हमारी वेबसाइय संगमनकार में दो नए कॉलम----

1 प्रियंवद का कॉलम “आइनाघर ” -----
इस कॉलम में विगत वर्षों में उनके द्वारा लिखी गई रम्य रचनाएं और प्रमुख हस्तियों से साक्षात्कार पुनः प्रकाशित किए जायेंगे ।
ये क़ॉलम प्रतिमाह पहले व तीसरे हफ्ते में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जायेगा ।
2 यायावर
इसमें हर बार एक नई रचना पोस्ट की जाएगी । यह साहित्य की यायावरी है। कभी कविता, कभी कहानी, कोई गीत, गज़ल, नज्म या कोई रम्य रचना पोस्ट की जायेंगी।
आप अपनी रचनाएं हमें sangamankar@gmail.com पर मेल कर सकते हैं ।
ये क़ॉलम प्रतिमाह दूसरे एवं चौथे हफ्ते में वेबसाइट पर प्रकाशित किया जायेगा।


आप हमारी साइट पर इन दोनो कॉलम को पढ़ सकते हैं

जीवेश प्रभाकर
संपादक, संगमनकार

Wednesday, January 18, 2017

विकल्प विमर्श मुक्तिबोध शताब्दी स्मरण श्रृंखला -4----


इस बार कविता ----
  मुझे कदम कदम पर
      (
मुक्तिबोध )
मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहे फैलाए !!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने...
सब सच्चे लगते हैं;
अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है
मैं कुछ गहरे मे उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए !!
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य-पीड़ा है,
पल-भर मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,
इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है जिंदगी !!
बेवकूफ बनने की खतिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ;
और यह देख-देख बड़ा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है
कि जगत्... स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियाँ लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहाँ जरा खड़े होकर
बातें कुछ करता हूँ...
...
उपन्यास मिल जाते।
दुःख की कथाएँ, तरह तरह की शिकायतें,
अहंकार विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
जमाने के जानदार सूरे व आयतें
सुनने को मिलती हैं।
कविताएँ मुसकरा लाग-डाँट करती हैं
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ
श्रद्धाएँ चढ़ती हैं !!
घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप-चित्र
लेकर मैं घर पर जब लौटता...
उपमाएँ द्वार पर आते ही कहती हैं कि
सौ बरस और तुम्हें
जीना ही चाहिए।
घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,
बाँहे फैलाए रोज मिलती हैं सौ राहें,
शाखाएँ-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं
नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय
रोज-रोज मिलते हैं...
और, मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है
और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है !!
-
मुक्तिबोध-
(प्रस्तुति -जीवेश प्रभाकर)

Saturday, December 31, 2016

विकल्प विमर्श : मुक्तिबोध स्मरण श्रंखला-3

इस बार कविता--
पूंजीवादी समाज के प्रति
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इतने प्राण, इतने हाथ, इनती बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद –
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर-जाल –
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, खूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र
तेरे ह्रास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।
(गजानन माधव मुक्तिबोध)

Friday, December 9, 2016

साहित्यिक परिदृश्य के जरूरी हस्ताक्षर विनोद शंकर शुक्ल – -जीवेश चौबे

    सर एक कार्यक्रम कर रहे हैं आपका सहयोग व मार्गदर्शन चाहिए .... आप कभी भी मोबाइल पर कहें और हमेशा जवाब आता , आ जाओ घर पर । चाहे कोई भी हो, सर . यानि सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार विनोद शंकर शुक्ल हर हमेशा साहित्यिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए हर तरह के सहयोग को तत्पर रहते। उनके लिए साहित्य एक जज्बा था, जुनूनू था  जो उन्हें लगातार शहर की तमाम गतिविधियों से जोड़े रखता था । लगभग चार दशकों से भी ज्यादा समय  से वे रायपुर के साहित्यिक परिदृश्य के जरूरी हस्ताक्षर की तरह थे । लगभग हर शाम वे पैदल सड़क पर चलते हुए एक चक्कर जरूर लगाते और पुराने बस स्टैंड स्थित किताब दुकान से होते हुए घर लौटते । यदि आपको उनसे मिलना हो तो आप शाम के वक्त इस ठिकाने पर जरूर मिल सकते थे।
      छत्तीसगढ़ के प्रमुख व्यंग्यकारों में एक विनोद शंकर शुक्ल का पूरा जीवन रायपुर के साहित्यिक वातावरण में गुजरा ।  नगर के हर साहित्यिक सांस्कृतिक आयोजनों में वे जरूर उपस्थित रहते ।  अपने नाम के अनुरूप वे एक खुशमिजाज, विनोदप्रिय थे । कॉलेज जीवन से ही वे साहित्य से जुड़ गए थे । आधी सदी से भी ज्यादा समय से वे हमारे परिवार से जुड़े रहे । पारिवारिक संबंध के अलावा पिता श्री प्रभाकर चौबे के व्यंग्यकार होने के कारण संबंध और घनिष्ठ होते चले गए । परसाईजी और शरद जोशी के पश्चात वे प्रभाकर चौबे को भी अपना आदर्श मानते थे। वे उन्हें बड़े भाई की तरह मानते थे और ताउम्र उन्होंने इस रिश्ते को निभाया ।  विनोदजी व्यंग्यकार होने के साथ साथ एक जबरदस्त घुमक्कड़ भी थे और पिता के साथ देश के तमाम स्थानो पर घूमने निकल जाया करते थे ।   साहित्य सम्मेलनो में दोनो जब भी जाते सम्मेलन के पश्चात साथ में आसपास के पर्यटन स्थलों के लिए निकल पड़ते । कन्याकुमारी ये लेकर हिमाचल या फिर नॉर्थ ईस्ट से लेकर द्वारका तक लगभग सभी जगह वे दोनो यायावर की तरह घूमते ।
      बहुत कम लोगों को पता है कि विनोदजी छत्तीसगढ़ महाविद्यालय के शासकीय होने के पूर्व  अनुदान प्राप्त अशासकीय महाविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष भी रहे । वे प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा से भी जुड़े रहे । एक लम्बे अरसे तक वे भारतीय जन नाट्य संघ ( इप्टा ) के रायपुर के अध्यक्ष रहे । एक बात और याद आती है कि बहुत पहले उन्होंने कर्फ्यू नाटक लिखा जिसका सार्वजनिक पाठ भी हुआ मगर संभवतः उसका मंचन नहीं हो पाया । विनोद जी पढ़ने के बहुत शौकीन थे, विशेष रूप से व्यंग्य ।लगभग हर व्यंग्यकार के संकलन उनके पास मौजूद थे और साथ ही अन्य किताबें भी । वे पूरी तरह साहित्य व संस्कृति को समर्पित थे । अपने इसी जूनूल के चलते उन्होंने अपने घर पर एक साहित्यिक आयोजनो के लिए संस्कृति नाम से एक हॉल ही बना लिया था जहां लम्बे समय तक कई साहित्यिक आयोजन, अनेक गोष्ठियां और कार्यक्रम होते रहे ।
      विनोद जी अपने शुरुवाती दिनो में अग्रदूत से भी जुड़े फिर बाद में लम्बे समय तक दैनिक नवभारत में उनके व्यंग्य प्रकाशित होते रहे । कहा जाए तो वे दूसरी पीढ़ी के प्रमुख व्यंग्यकारों में एक रहे । उन्होने व्यंग्य शती नामक त्रैमासिक पत्रिका भी लम्बे अरसे तक प्रकाशित की जिसका पूरे देश में विशेष स्थान रहा । काफी पहले उन्होंने नगर में एक व्यंग्य सम्मेलन भी करवाया था । विनोदजी के साथ एक बात बहुत अच्छी थी कि उन्हें किसी भी विषय पर बोलने का लिए बहुत ज्यादा तैयारी की जरूरत नहीं होती थी । मैं अक्सर अपने विभिन्न व विविध विषयों पर केन्द्रित आयोजनो में उनसे वक्तव्य के लिए आग्रह करता और वे सहज रूप से तैयार हो जाते ।
      मैं छत्तीसगढ़ महाविद्यालय में पत्रकारिता मे उनका छात्र भी रहा । साहित्य में रुचि के चलते मैं उनका विशेष प्रिय भी था । उसके पश्चात पिता से अलग मेरा उनसे एक विशेष संबंध बन गया जो लगातार प्रगाढ़ होता गया । उनके पुत्र अपराजित से मित्रता भी एक विशेष कारण रही । जब उनकी तबियत बिगड़ी तो मैं परेशान हो गया । उनके ऑपरेशन के पश्चात मैं उनसे मिलने अस्पताल गया । वे काफी नर्वस थे । वे चाहते थे लोगों से मिलना मगर तबियत के चलते यह संभव नहीं था । फिर जब वे अस्पताल से घर आए तो मैं वहां भी गया ।  मुझे लगा अब वे स्वस्थ होकर वापस सामान्य दिनचर्या में जल्द लौट आयेंगे मगर उन्हें इन्फैक्शन हो गया जो लगातार बिगड़ता गया और अंत में अपराजित उन्हें मुम्बई ले गया मगर हालत में कुछ सुधार नहीं पो पाया । एक मस्त मौला व्यक्ति यूं लगातार अकेलेपन मे टूटता सा गया । एक लम्बे अरसे से विनोदजी अपनी बीमारी से जूझ रहे थे । उनका घर से निकलना बंद था और वे मन मसोसकर असहाय से पड़े रहते थे । बीमारी से वे उतने दुखी नहीं हुए मगर सामाजिक संलग्नता से वंचित होने से वे लगभग टूट से गए थे ।
      अपराजित से उनका हालचाल पता चलता रहता था और जी की तो लगातार उनसे बात होती रहती थी । कुछ दिनो पहले ही तो अपराजित ने कहा था कि पापा बहुत तेजी से रिकवर कर रहे हैं और जल्द रायपुर आने वाले हैं । एकाध बार बातचीत के दौरान मैने अपराजित से कहा भी कि तुम सर को कोई आयोजन में ले जाया करो वे जल्द स्वस्थ हो जायेंगे । मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था । अकेलेपन और साहित्यिक विस्थापन से वे टूटते चले गए  । उनका जाना सबको उदास कर गया । वे हर उम्र के संस्कृतिकर्मी के मित्र सरीखे थे । सभी के लिए उनके मन में अपार स्नेह व सम्मान था । उनका जाना एक अपूरणीय क्षति है और नगर के साहित्यिक परिदृश्य से एक अध्याय का समाप्त होना है ।

---जीवेश चौबे