Monday, February 12, 2018

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 9- - प्रभाकर चौबे

        रायपुर शहर एक छोटे से कस्बे से धीरे धीरे आज छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में लगातार विकसित हो रहा है । इत्तेफाक ये भी है कि इस वर्ष हम अपने नगर की पालिका का150 वॉ वर्ष भी मना रहे हैं ।
         हमारी पीढ़ी अपने शहर के पुराने दौर के बारे में लगभग अनभिज्ञ से हैं । वो दौर वो ज़माना जानने की उत्सुकता और या कहें नॉस्टेलजिया सा सभी को है । कुछ कुछ इधर उधर पढ़ने को मिल जाता है। सबसे दुखद यह है कि कुछ भी मुकम्मल तौर पर नहीं मिलता। 
        बड़े बुज़ुर्गों की यादों में एक अलग सा सुकूनभरा वो कस्बा ए रायपुर अभी भी जिंदा है । ज़रा सा छेड़ो तो यादों के झरोखे खुल जाते हैं और वे उन झरोखों से अपनी बीते हुए दिनों में घूमने निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में हम आप भी उनके सहयात्री बनकर उस गुज़रे जमाने की सैर कर सकते हैं।
   इसी बात को ध्यान में रखकर हम अपने शहर रायपुर को अपने बुज़ुर्गों की यादों के झरोखे से जानने का प्रयास कर रहे हैं । इस महती काम के लिए छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे अपनी यादों को हमारे साथ साझा करने राजी हुए हैं । वे  रायपुर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रहे हैं । एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कोई रायपुर का अकादमिक इतिहास नहीं है ये स्मृतियां हैं । जैसा श्री प्रभाकर चौबे जी ने रायपुर को जिया । एक जिंदा शहर में गुज़रे वो दिन और उन दिनों से जुड़े कुछ लोगघटनाएंभूगोलसमाज व कुछ कुछ राजनीति की यादें ।  और इस तरह गुजश्ता ज़माने की यादगार तस्वीरें जो शायद हमें हमारे अतीत का अहसास कराए और वर्तमान को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सके।
        आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।
जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

        मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा थाखो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

                                                                
रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 9
सीपी एंड बरार.... मध्यप्रदेश उन दिनों इसी नाम का प्रदेश था । इसके प्रथम मुख्यमंत्री मतलब अंतरिम सरकार के मुख्य मंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के जन्म दिन पर कांग्रेस भवन के गाँधी चौक (मैदान) में एक बड़ी सभी हुई थी । इसमें स्कूली बच्चे भी शामिल थे । उस दिन खूब वर्षा हो रही थी । पं. रविशंकर शुक्ल का नगरिक सम्मान किया गया था, हम छोटे थे कौतुहल से सब देख रहे थे ।
मैंने तब पहली बार पं. रविशंकर शुक्ल जी को देखा - मुझे पता नहीं था कि वे प्रेदेश के मुख्यमंत्री हैं - स्कूल के बच्चों को बुलाया गया था , सो मैं भी उनमें शामिल था । लेकिन मुझे उनका यह कथन याद है कि देश जल्द आजाद हो जाएगा ... ।
उन दिनों स्कूल खुलते ही हैजे का टीका लगवाना अनिवार्य था - स्कूल -स्कूल टीका लगाने वाले आते । नगरपालिका की ओर से मुनादी कराई जाती थी .....  नागरिक कांकाली अस्पताल, काली बाड़ी चौक स्थित आईसोलेशन अस्पताल में जाकर हैजा का टीका लगा लें । यह भी मुनादी की जाती कि सड़े गले फल न खाये..... बासा अन्न ग्रहण न करें ....... मक्खियां ना होने दें ... 1
1946 में हैजा फैला । स्कूल के बच्चों की टोली लेकर पालिका के कर्मचारी फ्रूट मार्केट जाते और बच्चों से कहते कि सड़े-गले फल पैरों से रौंद डालो...बड़ा मजा आता । बच्चे अच्छे फल भी पैरों से रौंदने लगते दुकान वाला अरे अरे अरे करते रह जाता । पानी को उबाल कर पीने की हिदायद भी दी जाती । उस साल हैजा के कारण 10 दिनों के लिए जुलाई में विद्यालय बंद कर दिए गए थे । एक दहशत का वातावरण था । हैजा पर जल्दी काबू पा लिया गया .. लेकिन बाद में भी कुछ सालों तक जुलाई माह में हजा का टीका स्कूली बच्चों को लगाया जाता रहा
1946 में दिसम्बर माह में राजनांदगाँव में डिविजन स्कूल टूर्नामैंट हुआ - तीन दिनों का होता था यह टुर्नामेंट। हर साल अलग अलग जगह पर होता 1945 को रायपुर में हुआ था । मेरा हड्रेड यार्ड्स दौड़ में सिलेक्शन हुआ था और मेरे मित्र सुरेश (बाद में सुरेश देशलहरा छत्तीसगढ़ कॉलेज, रायपुर के प्राचार्य हुए) का सिलेक्शन 200 गज की दौड़ के लिये हुआ था सुरेश प्रथम आया मैं सफल नहीं हो सका था । हमारे स्कूल टीम चैम्पियन बनी इसमें एक छात्र बाबूराव अंतिम  दौड़ में एक्सपर्ट था - तेज दौड़ता । हमारे शिक्षक, श्री पाद्धे सर, स्कूल के प्लेयर छात्रों से रोज पूछते कि रेगुलर दौड़ रहे हो न ... । वे बड़ी रूचि लेते ।
रायपुर स्थित नार्मल स्कूल कबड्डबी और रस्सा खींच में हर साल चैम्पियन बनती । रायपुर तथा अन्य शहरों के लिए भी प्राथमिक विद्यालय स्तर के स्कूल टुर्नामेंट होते  - गुरुजी अपने बच्चों को तैयार कराते - अमीनपारा व बूढ़ापारा प्राथमिक स्कूल का उन दिनों स्कूली टुर्नामेंट में दबदबा था उन दोनों में से कोई एक चैम्पियन ट्राफी जीतती.... जो टीम चैम्पियन बनती  उसे यह प्रदान की जाती । बाद में चौबे कॉलोनी स्कूल लगातार इस पर कब्जा करती रही पता नहीं अब शील्ड कहां है, किस स्थिति में है। यह शील्ड खूब बड़ी थी । 
1946 में घरों में महंगाई की चर्चा होने लगी - अनाज महंगा हुआ था - पहले बीड़ी का कट्टा एक पैसा था वह दो पैसा हो गया - घोड़ा छाप माचिस की कीमत भी बढ़ी थी - दूध और घी भी महंगे हुए थे - परमसुख धोती की कीमत आठ आने बढ़ी थी - घरों में मंहगांई पर चर्चा होने लगी  थी । राशन का सामान समय पर मिलता नहीं था। लम्बी-लम्बी लाईन लगने लगी थी - स्कूल से आते ही बच्चों को राशन के लाईन में खड़ा होने भेजा जाने लगा था ।
उसी साल शहर में किसी कम्पनी ने मुफ्त में बनी चाय बांटने का काम शुरु किया - मोहल्ले के नुक्कड़ पर चाय का ठेला खड़ा होता । जितना चाय पीना हो वह बर्तन में डाल देता था । लगभग आठ नौ माह यह सिलसिला चला फिर बंद हो गया .. लोगों को चाय की लत हो गई - चाय का पेकेट खरीदकर घर में चाय बनाने लगे और इस तरह घर-घर चाय आई, लेकिन बच्चों को चाय नहीं दी जाती थी ... ।
एक रोचक बात यह कि स्कूलों में प्रतिवर्ष पुराने सामान जैसे फुटबाल, हॉकी स्टिक, रेकेट आदि की नीलामी की जाती ... जरा भी अच्छा हो तो बच्चे एकाध सामान खरीद लेते - जरा सुधराकर उससे खेलते ।

....जारी....

Tuesday, February 6, 2018

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 8- - प्रभाकर चौबे

        रायपुर शहर एक छोटे से कस्बे से धीरे धीरे आज छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में लगातार विकसित हो रहा है । इत्तेफाक ये भी है कि इस वर्ष हम अपने नगर की पालिका का150 वॉ वर्ष भी मना रहे हैं ।
         हमारी पीढ़ी अपने शहर के पुराने दौर के बारे में लगभग अनभिज्ञ से हैं । वो दौर वो ज़माना जानने की उत्सुकता और या कहें नॉस्टेलजिया सा सभी को है । कुछ कुछ इधर उधर पढ़ने को मिल जाता है। सबसे दुखद यह है कि कुछ भी मुकम्मल तौर पर नहीं मिलता। 
        बड़े बुज़ुर्गों की यादों में एक अलग सा सुकूनभरा वो कस्बा ए रायपुर अभी भी जिंदा है । ज़रा सा छेड़ो तो यादों के झरोखे खुल जाते हैं और वे उन झरोखों से अपनी बीते हुए दिनों में घूमने निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में हम आप भी उनके सहयात्री बनकर उस गुज़रे जमाने की सैर कर सकते हैं।
   इसी बात को ध्यान में रखकर हम अपने शहर रायपुर को अपने बुज़ुर्गों की यादों के झरोखे से जानने का प्रयास कर रहे हैं । इस महती काम के लिए छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे अपनी यादों को हमारे साथ साझा करने राजी हुए हैं । वे  रायपुर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रहे हैं । एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कोई रायपुर का अकादमिक इतिहास नहीं है ये स्मृतियां हैं । जैसा श्री प्रभाकर चौबे जी ने रायपुर को जिया । एक जिंदा शहर में गुज़रे वो दिन और उन दिनों से जुड़े कुछ लोगघटनाएंभूगोलसमाज व कुछ कुछ राजनीति की यादें ।  और इस तरह गुजश्ता ज़माने की यादगार तस्वीरें जो शायद हमें हमारे अतीत का अहसास कराए और वर्तमान को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सके।
        आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।
जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

        मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा थाखो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

                                                                
रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 8

वार टाईम (युद्ध) था । हर चीज की किल्लत चल रही थी । मंहगाई भी बढ़ी थी। 1945 से पहले वेतन में महंगाई भत्ता नहीं होता था । उन दिनों घोड़ा छाप माचिस  चलती था । अच्छी क्वालिटी की माचिस थी । उसमें 60 काड़ी (स्टीक) होती थी । माचिस पर छपा रहता था 60 काड़ी । और साठ काड़ी ही होती - गिनने तो कोई एक कम निकले तो फुड ऑफिस में शिकायत कर सकता था ।  वार टाईम में घोड़ा छाप माचिस की किल्लत पैदा कर दी गई - घोड़ा छाप माचिस मिलना कठिन होने लगा था। ब्लेक में मिलने लगा । कुछ युवकों ने एक दुकान की पिकेंटिंग की थी । सबसे ज्यादा मिट्टी तेल के लिए मारामारी थी । स्टोव के लिये, लालटेन, गैसबत्ती चिमनी जलाने, मिट्टी तेल  चाहिए होता - उन दिनों बिजली कुछ ही घरों में थी । मिट्टी तेल की डटकर कालाबाजारी के लिये एक अभिनव तरीका अपनाया गया था - पीतल की बड़ी गुण्डियों में मिट्टी तेल भरकर बोझा उठाने वालियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने कहा जाता जिस तरह गुंडी में पानी भरकर ले जाया जाता है - देखने वाले समझे, बाई पानी ले जा रही हैं । एक बार ताक कर पुलिस ने पकड़ा और पूरे शहर में हल्ला हो गया। लोग इस तरह के काम को देख अचम्भित हुए .. क्या जमाना आ गया है, ऐसा कहते रहे । कंट्रोल में एम्प्रेस मिल का लट्ठा मिलता था - अच्छा मजबूत । वैसे मिलावट आई नहीं थी - शुद्ध ही मिलता था सब ।
उन दिनों (काफी बाद तक यह चला) शानिवार या रविवार को मैटनी शो पिक्चर का रिवाज था । एक तो अंग्रेजी मारधाड़ वाली फिल्म आती थी - खूब भीड़ होती इनमें । टार्जन सीरियल की फिल्में भी लोकप्रिय  थीं - जॉन सेमुअल नामक युवा टार्जन के रूप में फेमस हो गया था । ट्वेन्टिएथ सेन्चुरी फॉक्स की स्टंट फिल्में बहुत लोकप्रिय थीं । पुरानी हिन्दी फिल्में भी मैटनी में दिखाई जाती थीं। फिल्म शुरु होने से पूर्व ओम जय जगदीश हरे ... रिकाडिंग बजता मतलब फिल्म शुरू होने वाली है । लोग दौड़ते थर्ड क्लास दो आना, सेकंड क्लास चार आना, फर्स्ट क्लास छ: आना, बल्कनी बारह आना ... महिलाओं के बैठने की अलग व्यवस्था थी ... इंटरवल में पर्दा खींच दिया जाता था । शारदा टाकीज में ऊपर बालकनी के दोनों छोर पर बाक्स थे - इसमें उच्च अधिकारी बड़े लोग, ही एलाऊ थे ।
बाबूलाल टाकीज में स्टंट फिल्में खूब लगती थीं - उन दिनों नाडिया जॉन कवास की जोड़ी प्रसिद्ध थी। इनकी हंटरवाली फिल्म कई हफ्ते चली थी। भगवान दास-जानकी दास की जोड़ी उभर रही थी । रामराज्य फेम कलाकार प्रेम सदीब ने एक सामाजिक फिल्म बनाई थी और उसके प्रीमियर पर बाबूलाल टॉकिज में उपस्थित हुए थे - गजब की भीड़ हो गई थी । खूब धक्का-मुक्की हुई थी । 
कोतवाली चौक पर पीपल झाड़ ( जो हाल ही में काट दिया गया है ) से सटकर पाटे पर मनिया पान दुकान प्रसिद्ध थीं एक जयराम पान दुकान (शारदा चौक) और मनिया पान दुकान । यहीं हिम्मत लाल मानिक चंद की कपड़े की दुकान  थी - यहाँ नामी मिलों के कपड़े बिकते थे - ऊनी कपड़े भी यहीं मिलते थे । इसी भवन के ऊपर बाम्बे भोजनालय था - जिसका रेट उन दिनों - फुलथाली आठ आना घी चपुड़ी रोटियां चाहिए तो दस आना ... वैसे गिरधर धर्मशाला और एडवर्ड रोड में भी भोजनालय थे .. बासा कहते थे । उन दिनों घरों में चूल्हे पर खाना बनता अत: प्राय: हर मोहल्ले में लकड़ी टाल  होते -- उन दिनों जलाऊँ लकड़ी, चिरवा आठ आने मन और गोलवा छ: आने मन बिकता इसे भी महंगा कहा जाता ।
श्री राम संगीत विद्यालय की स्थापना हो गई थी और विद्यालय चलने लगा था । श्री जोशी जी संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध थे । तबला वादक के रूप में उस समय श्री रामानंद कनौजे जा का नाम ऊपर था वे राष्ट्रीय स्कूल के प्रधानपाठक भी थे।
श्याम टाकीज बनने से पूर्व वहाँ से बूढ़ेश्वर मंदिर तक सीताफल के झाड़ थे - आज जहाँ स्टेडियम है वहाँ दलदल था - एक डबरी भी थी और एक बावड़ी भी थी । सदर की होली उन दिनों भी प्रसिद्ध थी । यहाँ राजस्थान से नौटंकी पार्टी व पुतली नाच दिखाने वाले आया करते थे । सदर में रहने वाले भीखमचंद बैद हिन्द स्पोर्टिंग फुटबाल टीम में राईट फुल बैक में खेलत थे और फेमस थे । बाद में उनके भाई अमरचंद बैद हिन्द स्पोर्टिंग फुटबाल टीम के गोलकीपर के रूप में खेले ।
अमर चंद बैद अच्छे स्टेज एक्टर-डायरेक्टर  रहे। काली बाड़ी दुर्गोत्सव में एक दिन हिन्दी नाटक प्रस्तुत किया करते थे । सप्रे स्कूल (लारी स्कूल) के पी.के.सेन शिक्षक अच्छे नाटक डायरेक्टर के रूप में प्रख्यात थे । मुन्नालाल पापा लाल की किराना तेल-घी-आता था । गोल बोजार के अंदर एक लाईन से अनाज की दुकाने थीं - उसी से लगकर सब्जी मार्केट था । गोलबाजार के मूल भवन के अंदर महिलाओं के उपयोग की वस्तुएं बिकती थीं - दोपहर यहाँ भीड़ होती। पुरुष प्राय: यहाँ नहीं जाते थे । भवन से निकलते ही राष्ट्रीय  बुक डिपो से लगकर जो खाली जगह थी वहाँ रोज ही शाम को बाजीगर अपना खेल दिखाता - बंदर नचाता, भालू नचाता ....
गोल बाजार में किताबों के तीन दुकान थीं - राष्ट्रीय विद्यालय बुक डिपो, गालाल चुनकाई लाल और कसिमुद्दीन के किताब की दुकान । सदर बाजार में दो चरित्र बड़े प्रसिद्ध थे एक हाफिज भाई, हाफिज भाई कहते कि वे नरगिस (फिल्म अभिनेत्री) से मोहब्बत करते हैं - दीवानों सा व्यवहार करते । सदर में युवा उन्हें घेरकर नरगिस के किस्से सुनते । एक थे अरमान भाई - अरमान भाई किसी भी दुकान  के सामने खड़े होकर गालियाँ देने लगते - दुकानदार उन्हें चार-छ: आने देकर मुक्त होता ...। उनकी गालियों का कभी किसी ने बुरा नहीं माना ।
क्या जमाना था - हम बच्चे थे, लेकिन उत्सुकतावश पता चला ही जाता था कि क्या हो रहा है। ।बालसमाज गणेशोत्सव समिति शायद रायपुर की सबसे पुरानी समिति है - शायद पहली समिति ।  उन दिनों गणेशोत्सव पर प्राय: हर गणेश पंडाल में कुछ न कुछ कार्यक्रम होते बच्चों के लिए कहानी कथन, कवितापठन, वाद-विवाद प्रतियोगिता, गान प्रतियोगिता आदि । मुझे याद है सन् 1946 में आनन्द समाज गणेशोत्सव में कहानी कथन पर प्रथम पुरस्कार मिला - पुस्तक दी गई महाभारत मीमांसा - आज भी  मेरे किताबों की रैक में है
उन दिनों सब्जी - फल के ठेले घूमते नहीं थे - लेना हो तो बाजार जाना पड़ता था - हाँ मुर्रा-लाई, करी लड्डू -  मुर्रा लाड़ू बेचने वाली जरुर निकलती थीं । आईस्क्रीम नहीं आई थी, लेकिन कुल्फी (बास की काड़ी में) बच्चों को आकर्षित करने हाजिर थी और बर्फ का गोला भी मिलता था । बाम्बे-हावड़ा मेल शाम पाँच बजे रायपुर पहुँचती थी - 2 अप कहलाती थी - उसमें रसोईयान था और ब्रेड मतलब डबलरोटी बिकती थी शहर के वे जो उच्छा ब्रेड चाहते, इस ट्रेन में लेने जाते । मेल में डाक का डिब्बा भी होता था -इनमें अपने पत्र डाल सकते थे - उन दिनों डिब्बे में पत्र डालना हो तो एक पैसा की टिकिट अतिरिक्त चिपकानी पड़ती थी ।
उन दिनों स्कूल से छुट्टी के बाद या तो फुटबाल खेलते, पुक (रबर की छोटी गेंद) या सड़क पर ही चकरबिल्ला खेलते या लोहे के बिल्लास भर लम्बे टुकड़े को नाली किनारे की गीली जगह में पटक कर गाड़ने का खेल खेलते-लोहे का वह टुकड़ा गीली मिट्टी में गड़ा नहीं तो एक पैर पर दौड़ने का दाम देना पड़ता था - लगड़ी दौड़ रहे और पीछे दिगर बच्चे चिल्लारहे - लगंड़ी घोड़ी टांग तोड़ी । दाम न देकर भागने बाले को चिढ़ाते - दाम-दाम बच्चा मगर का बच्चा ... । रविवार को एक खेल खेला जाता छिपा-छुपाऊल......

जारी.....

Monday, February 5, 2018

खतरे में हैं दोनों...बाज़ार के दरख्त, सवाल के दरख्त------ जीवेश प्रभाकर

पौधों को पानी नहीं , आग को हवा देने लगे हैं.....

जिब्बू पैमाने तरक्की के कितने सख्त हो गए
कि जिसकी राह में  फ़ना  कई  दरख्त़  हो गए

निपट नीले आकाश की सुंदरता के साथ तीखी आग सी धूप का गर्म अहसास भी होता है जो अक्सर घर से निकलते ही परेशान करता है । ये गर्म अहसास किसी छांव की पनाह मांगता है । शहरों में ये पनाह अक्सर किसी बहुमंजिली इमारत की फैलती परछाइयों में होती है मगर इन परछाइयों में पैर पसारे बाज़ार आपको कहीं खड़े नहीं होने देते । इन परछाइयों के रखवाले सिर्फ बाज़ार के ग्राहकों पे ही मेहरबान हुआ करते हैं , राह चलते किसी राहगीर को इन परछाइयों में कोई राहत नहीं मिल सकती ।
किसी विशाल दरख्त की ठंडी घनी छांव हमेशा सुकून ही देती है । अपने छुटपने में कभी अपने पिता की सायकल पर या मां के साथ पैदल बाजार आते थककर कभी ऐसे दरख्तों के नीचे कुछ पल खड़े हो चुके होते हैं सभी ।
कुछ ऐसे भी दरख्त होते हैं जिसके बारे में पिता बताए होते हैं कि उनके पिता को भी नहीं मालूम था ये किसने लगाए, कब लगाए। यूं पीढियों से अपने जन्म को लेकर प्रश्नचिन्ह में घिरे दरख्त को एक दिन यकायक कोई गिराकर हमेशा के लिए उसे प्रश्नपत्र से बाहर कर देता है। फिर क्यों गिराया भी एक अनुत्तरित प्रश्न बना रह जाता है । हतप्रभ से लोग बस देखते रह जाते हैं, फिर होश में आने पर कुछ हलचल होती है और लोग फिर सवाल करते हैं कि क्यों गिराया ....। बाज़ार फिर बड़ी हिमाकत से ऐसे सवाल पूछने वालों को धमकाता है कि गिराना था गिरा दिया, तुमने कैसे पूछा,  क्यों गिराया ....
कुछ संजीदा लोगों के दिलो दिमाग पे मगर सवाल दर सवाल लगातार एक घन की मानिंद चोट पर चोट कर रहे हैं । एक ऐसा तबका है जो भीतर ही भीतर समाज को छीजता, टूटता देख रहा है और टूटकर बिखर जाने की हद तक की आशंकाओं से घबरा रहा है और घबरा के सवाल भी करता है । ये सवाल, ये चिंता ...ये भी दरख्त ही हैं जहां अफवाहों की गर्मी से समाज को सुकून भरी पनाह मिलती है । लोग ऐसे दरख्तों को भी उखाड़ फेंकना चाहते हैं । कई मर्तबा बाजार इसे उनके सुविधाजनक या सधे बधे, गुने चुने विरोध का जामा पहनाकर उनकी चिंताओं को सतही बताकर उपेक्षा या मजाक का विषय बना देते हैं ।  
बाज़ार ने इधर चिंताओं के भी पैमाने बना दिए हैं, नए नैरेटिव नए आख्यान बना दिए गए हैं । मेरी चिंता तेरी चिंता से बड़ी या राष्ट्रहितकारी , तेरी चिंता से झांकता देशद्रोह, विघटनकारी...। बाज़ार चिंता को भी एक साझा संगठित चिंता नहीं होने दे रहा।
सभी घर से निकलते हैं लौटकर आने के लिए ही । घर से निकलो तो राह के दरख्त छांव देते हैं पनाह देते हैं । पौधों को पानी दो तो वे फलदायी नहीं तो सुकून देने वाले विशाल दरख्त में तो तब्दील हो ही जाते हैं । छांव जलते हुए को ठंडक देती है। सवालों चिंताओं के दरख्त भी पनाह देते हैं जबकि अफवाह आग होती है और आग को हवा दो तो वो तेजी से फैलती है । सवालों व चिंताओं के दरख्तों की पनाह के अभाव में अफवाहों को हवा मिलती है और ये तेजी से पैर पसार लेती है । अफवाहों की इस लपट में बाज दफा घर से निकले कुछ लोग लौटकर नहीं आ पाते । जो लौटकर नहीं आ पाते उनके घर पे राह तकती निगाहें एक अरसे तक जाने वाले का पीछा करती कहीं शून्य में खोकर रह जाती हैं।
 इधर आजकल पौधों को पानी देने की बजाय आग को हवा देने का चलन बढ़ गया है । …..
जीवेश प्रभाकर
जारी......



      

Saturday, January 13, 2018

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 7- - प्रभाकर चौबे

        रायपुर शहर एक छोटे से कस्बे से धीरे धीरे आज छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में लगातार विकसित हो रहा है । इत्तेफाक ये भी है कि इस वर्ष हम अपने नगर की पालिका का150 वॉ वर्ष भी मना रहे हैं ।
         हमारी पीढ़ी अपने शहर के पुराने दौर के बारे में लगभग अनभिज्ञ से हैं । वो दौर वो ज़माना जानने की उत्सुकता और या कहें नॉस्टेलजिया सा सभी को है । कुछ कुछ इधर उधर पढ़ने को मिल जाता है। सबसे दुखद यह है कि कुछ भी मुकम्मल तौर पर नहीं मिलता। 
        बड़े बुज़ुर्गों की यादों में एक अलग सा सुकूनभरा वो कस्बा ए रायपुर अभी भी जिंदा है । ज़रा सा छेड़ो तो यादों के झरोखे खुल जाते हैं और वे उन झरोखों से अपनी बीते हुए दिनों में घूमने निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में हम आप भी उनके सहयात्री बनकर उस गुज़रे जमाने की सैर कर सकते हैं।
   इसी बात को ध्यान में रखकर हम अपने शहर रायपुर को अपने बुज़ुर्गों की यादों के झरोखे से जानने का प्रयास कर रहे हैं । इस महती काम के लिए छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे अपनी यादों को हमारे साथ साझा करने राजी हुए हैं । वे  रायपुर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रहे हैं । एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कोई रायपुर का अकादमिक इतिहास नहीं है ये स्मृतियां हैं । जैसा श्री प्रभाकर चौबे जी ने रायपुर को जिया । एक जिंदा शहर में गुज़रे वो दिन और उन दिनों से जुड़े कुछ लोगघटनाएंभूगोलसमाज व कुछ कुछ राजनीति की यादें ।  और इस तरह गुजश्ता ज़माने की यादगार तस्वीरें जो शायद हमें हमारे अतीत का अहसास कराए और वर्तमान को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सके।
        आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।
जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

        मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा थाखो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

                                                                
रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 7
वे दिन स्वप्न की तरह लगते है । बूढ़ापारा ढाल से पहले एक तेलगू सान के बाड़े में हम किराये के  मकान में रहने आए - वहाँ और भी परिवार थे । घर से आगे सड़क पर बाड़े में हम साथी
होली जलाने लकड़ी चुराकर लाते - पीछे एक लकड़ी टाल भी वहाँ से रात को चोरी करते - उन दिनों लकड़ी चुराना होली-धर्म-सा था - जो बैलगाड़ियाँ सड़क से निकलती उनके पाटे तोड़ कर ले भागते, बैलगाड़ी वाला बैल हकालने के कोड़ो से हमें मारकर भगाने की कोशिश करता लेकिन उस झुंड से कितना  पार पाते ।     हमारे एक शिक्षक थे - शुक्ला सर, वे फुल ड्रेस्ड  स्कूल आया करते थे - फुल ड्रेस्डमतलब... फुलपेंट, कोट टाई....    । बाहर भी वे हमे इसी ड्रेस में दिखते । बहुत कड़क टीचर माने जाते थे -  उन्हें ग्रामर का कीड़ा कहा जाता - अंग्रेजी के दूसरे पश्न पत्र में व्याकारण सम्बन्धी कठिन प्रश्न पूछते रहे । लेकिन स्कूल व क्लास के बाहर बहुत सहज व कोमल थे - निर्धन जरुरतमंद विद्यार्थी  की परीक्षा फीस भर देते थे । एक शिक्षक श्री बी.सिंह भूगोल के थे वे ब्लेकबोर्ड पर पूरा का नक्शा हाथ से खींच देते - कहते प्रश्न के उत्तर के साथ स्केच व नक्शा जरुर देना चाहिए । वे  भूगोल के अच्छे  शिक्षक रूप में जाने जाते । दूसरे भूगोल शिक्षक सोहन लाल की किताब खरीदने कहते । बी.सिंह सर ने भी भूगोल की एक किताब लिखी थी। वे शिक्षकों के संगठन के नेता भी थे । 1945-46 में एक दिन एक एक शिक्षक कक्षा में आते रहे, अपने-अपने पीरिएड के अनुसार, लेकिन पढ़ाया नहीं और न ब्लेक बोर्ड पर कुछ लिखा - पूछने पर कहा आज हमारी चाक डाऊन स्ट्राइक है । बहुत बाद में क्लर्कों की पेन डाऊन स्ट्राइक सुनने में आई और मजदूरों की टूल्स डाउन स्ट्राइक । 
    शहर में उन दिनों अच्छे पुस्तकालय हुआ करते थे ।  सदर बाजार में जैन मंदिर के बाजू की गली में मदन पुस्तकालय, बाल समाज लाइब्रेरी, आनन्द समाज लाइब्रेरी, पुष्टिकर पुस्तकालय, बूढ़ेश्वर मंदिर के प्रांगण में ऊपर कमरे में, पुरानी बस्ती में किशोर पुस्तकालय आदि कुछ प्रमुख पुस्तकालय रहे । प्राय: हर स्कूल में अपने पुस्तकालय हुआ करते थे - इनमें उन दिनों सरस्वती पत्रिका मंगाई जाती थी ।
वैसे उन दिनों शहर में अखाड़े भी काफी प्रसिद्ध थे, जैसे दूधाधारी मठ का अखाड़ा, अम्बादेवी मंदिर का अखाड़ा, बैजनाथ पारा का अखाड़ा गंजपारा का अखाड़ा । इनमें कोई शुल्क लगता नहीं  था । सिखाने के लिये कुछ पहलवान भी हाजिर रहते ।
गणेश उत्सव में उन दिनों स्थानीय कवियों का कवि सम्मेलन होता । उन दिनों इन कवि सम्मेलनों में घनश्याम प्रसाद , स्वराज प्रसाद त्रिवेदी, नंद किशोर पटेरिया, कृष्ण कुमार चौबे (नयापारा) तथा और भी कवि भाग लेते। नयापारा स्थित रामचन्द्र संस्कृत पाठशाला में संस्कृत काव्य पाठ का आयोजन किया जाता । उन दिनो बिजली से नहीं , गैस बत्ती से उजाला हुआ करता था । शहर में जगह जगह म्युनिसिपल के स्ट्रीट लैम्प लगे थे - शाम को एक व्यक्ति सीढ़ी लेकर आता और लैम्प में मिट्टी तेल भरता तथा जलाकर आगे बढ़ लेता। गर्मी के दिनों में सड़को पर मोटर से पानी का छिड़काव किया जाता । फिर गणेश उत्सव की बात एक बार और, लोहार चौक में काँच से सजे गणेश की सजावट होती । पहले पुरानी बस्ती खो खो पारा में खो खो तालाब में गणेश ठंडे किए जाते - पुरानी बस्ती से लोहार चौक से मुड़कर गणेश का जुलूस पुरानी बस्ती की टूरी हटरी से होकर खोखो तालाब जाता - बाद में लाखे नगर  के आगे  का लेन से मुड़कर खोखो तालाब जाने लगा । बहुत बाद में काफी साल तक फिर बुढातालाब में गणेश विसर्जन होता रहा और अब तो खारून नदी में हो रहा है। उन दिनों विसर्जन के दूसरे दिन खो खो तालाब मे ही भोजली का मेला लगता । शाम को घर घर जा कर भोजली देते कुछ लोग भोजली भी बदते । यह छत्तीसगढ़ की विशेषता है । स्कूलों में भोजली की आधे दिन की छुट्टी दी जाती थी । उन दिनों हिन्द स्पोर्टिंग फुटबाल  फाइनल देखने भी स्कूलो में आधे दिन की छुट्टी भी दी जाती थी । पहले हिन्द स्पोर्टिंग फुटबाल प्रतियोगिता के लिये कोई शुल्क नहीं लगता था ।....
जारी....

Wednesday, January 3, 2018

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 6- - प्रभाकर चौबे

        रायपुर शहर एक छोटे से कस्बे से धीरे धीरे आज छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में लगातार विकसित हो रहा है । इत्तेफाक ये भी है कि इस वर्ष हम अपने नगर की पालिका का150 वॉ वर्ष भी मना रहे हैं ।
         हमारी पीढ़ी अपने शहर के पुराने दौर के बारे में लगभग अनभिज्ञ से हैं । वो दौर वो ज़माना जानने की उत्सुकता और या कहें नॉस्टेलजिया सा सभी को है । कुछ कुछ इधर उधर पढ़ने को मिल जाता है। सबसे दुखद यह है कि कुछ भी मुकम्मल तौर पर नहीं मिलता। 
        बड़े बुज़ुर्गों की यादों में एक अलग सा सुकूनभरा वो कस्बा ए रायपुर अभी भी जिंदा है । ज़रा सा छेड़ो तो यादों के झरोखे खुल जाते हैं और वे उन झरोखों से अपनी बीते हुए दिनों में घूमने निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में हम आप भी उनके सहयात्री बनकर उस गुज़रे जमाने की सैर कर सकते हैं।
   इसी बात को ध्यान में रखकर हम अपने शहर रायपुर को अपने बुज़ुर्गों की यादों के झरोखे से जानने का प्रयास कर रहे हैं । इस महती काम के लिए छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे अपनी यादों को हमारे साथ साझा करने राजी हुए हैं । वे  रायपुर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रहे हैं । एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कोई रायपुर का अकादमिक इतिहास नहीं है ये स्मृतियां हैं । जैसा श्री प्रभाकर चौबे जी ने रायपुर को जिया । एक जिंदा शहर में गुज़रे वो दिन और उन दिनों से जुड़े कुछ लोगघटनाएंभूगोलसमाज व कुछ कुछ राजनीति की यादें ।  और इस तरह गुजश्ता ज़माने की यादगार तस्वीरें जो शायद हमें हमारे अतीत का अहसास कराए और वर्तमान को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सके।
        आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।
जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

        मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा थाखो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

                                                                
रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 6
शारदा चौक पर भागीरथी मिष्ठान भंडार है, यह 1943 में 43 साल का हो गया था । उससे लगकर बनऊराम साहू किराना दुकान है, यह उस समय भी थी । फूल चौक की ओर बढ़ने पर डॉ.. दाबके का दवाखाना था, वे उन दिनों बच्चों के श्रेष्ठ डॉक्टर माने जाते थे और उनके दवाखाना में सुबह-शाम दोनों समय खूब भीड़ होती थी। उनके दवाखाना के बाजू यादव न्यूज एजेंसी थी - नागपुर के अखबार शाम की पैसेंजर से पहुँचते थे और बंटते थे -  कुछ लोग सीधे एजेंसी के दफ्तर से अखबार खरीद लेते थे । उन दिनों रायपुर से कोई दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित नहीं होता था अत: शाम को पहुँचने वाले नागपुर के अखबारों पर ही निर्भर रहना होता था ।
चालीस के दशक में शारदा चौक एक फुटबाल का मैदान था - यहाँ फुटबाल टुर्नामेंट भी होते थे। उन दिनों रेल्वे टीम में खिलाड़ी मनोहर भाई बढ़िया गोलकीपर के रूप में प्रसिद्ध थे । 1945 में रेल्वे टीम में डाक्टर बंधु शामिल हुए और बड़े भाई केनवास का जूता पहनकर फुटबाल खेलने वालों में थे - वे अपने बढ़िया डाज्  के लिए प्रसिद्ध थे ।
राजकुमार कॉलेज की टीम भी अच्छी थी । राजकुमार कॉलेज की टीम कॉलेज की वैन में (नीले रंग की) खेलने के लिये  मैदान तक आती थी - फिंगेश्वर राजघराने के महेन्द्र बहादुर सिंह अच्छे स्कोरर माने जाते थे वो और उनके भाई दोनो फुटबाल खेलते थे - मैंने दोनों का खेल देखा है । हिन्द स्पोर्टिंग फुटबाल समिति भी प्रतिवर्ष फुटबाल प्रतिस्पर्धा कराती थी। इसमें अधिकतर बी.एन.आर रेल्वे (बाद में साऊथ ईस्टर्न)  एवं रेल्वे  के प्रमुख स्टेशनों में रेल्वे कर्मचारियों की टीम आती रही - जैसे रायगढ़ा, राजमुहेन्द्र, खरियार रोड, जमशेदपुर, खुर्दारोड बिलासपुर आदि । रायपुर की रेल्वे टीम भी मजबूत टीम मानी जाती थी । कांपा और हिन्द स्पोर्टिंग फुटबाल टीम भी ख्यात प्राप्त थी । ब्राह्मण पारा के युवक ही टुर्नामेंट की पूरी व्यवस्था करते थे - खिलाड़ी भाव से । कामठी की टीम रब्बानी क्लब का खेल देखने पूरा मैदान भर जाता था । मालवीय रोड स्थिति डायमंड होटल में संचालक बेचर भाई फुटबाल मैच देखने रोज ही आते और मैच के दौरान जोर-जोर से आवाज देने के लिए उन दिनों प्रसिद्ध रहे - बाद में साईंस कॉलेज के प्रोफेसर सुब्रामणयम भी मैच के दौरान चिल्लाते और उनकी आवाज अलग पहचान ली जाती .. यह बहुत पहले की बात है ।
बनऊराम साहू की किराना दुकान से ठीक  लगकर सड़क बंजारी चौक की ओर जाती है उसी पर यादव सोडा फैक्टरी थी । शाम- रात को यहाँ सींग लेकर पीने वाले आते - इसी से
आगे उन दिनों की प्रसिद्ध सिदद्की बैंडपार्टी थी - यह खूब सराही जाती और जिस भी शादी में यह बुलाई जाती, उसकी चर्चा होती । उसी रोड में आगे बढ़ने पर नयापारा का जो लेन मुड़ता है उस पर काला फर्श बेचने की एक दुकान थी । दुकान पर एक बोर्ड लगा था - राजिम-बसीम के करिया फरस के पथरा । यहाँ रेत भी बिकती थी । नयापारा से म्युनिसिपल के वार्ड मेम्बर तुलसीराम तिवारी जी थे ।
रायपुर म्युनिसिपल कमेटी की स्थापना 1868 में की गई थी । शारदा चरण तिवारी 1943 में म्युनिसिपल कमेटी के पहले गैर सरकारी प्रशासक बनाए गए थे। उसके बाद 1947 में हुए चुनाव में पालिका अध्यक्ष बने और 1957 तक उस पद पर रहे। 1957 में बुलाकी लाल पुजारी पालिका अध्यक्ष निर्वाचित हुए ।
शारदा चौक नाम इसलिए पड़ा कि वहां चौक पर शारदा टॉकीज थी, जो बाद में कई बरसों तक जयराम टॉकीज के रूप में जानी जाती रही और आज वहां जयराम कॉम्प्लैक्स है । इसी परिसर में पटेरिया चाय की दुकान थी। यह खूब चलती थी। और वहाँ उन दिनों मीठा समोसा बनते थे जिसकी अच्छी डिमांड थी । एम. जी. रोड में मनोहर टाकीज थी जो बाद में कई बरस शारदा टॉकीज के नाम से चली जिसका पूर्व नाम सप्रे टाकिज था ।
नेशनल हाईवे राजकुमार कॉलेज बनने से पूर्व, मतलब 1882 के पूर्व उसी स्थान से होकर जाता और जब रामकुमार कॉलेज के लिये जमीन ली गई तो नेशनल र्हाईवे कालजे के सामने बना दी गई - कॉलेज के प्राचार्य श्री भालेकर के क्वाटर के सामने एक पत्थर गड़ा था जिस पर लिखा था - नागपुर 200 मील .. इससे लगता है कि नेशनल हाईवे पहले पुरानी बस्ती होकर जाता रहा होगा । बाद में राजुकमार कॉलेज के सामने से बनाया गया तो तात्यापारा होकर जाने लगा । पुराना बस स्टैंड के सामने सप्रे जी का बड़ा सा मकान था, जहां आज बॉम्बे मार्केट है । उनके घर उन दिनों रेडियो था - जब कम घरों में ही रेडियो होता था । मैने 1948 में गाँधी हत्या का समाचार उनके ही रेडियो में सुना - पं. जवाहर लाल नेहरू ने देश को सम्बोधित करते हुए कहा था कि किसी पागल ने हत्या की ... ।
पुराना बस क्टैंड में रायपुर से विभिन्न स्थानों के लिए बस छूटती थी । इससे पूर्व गाँधी चौक में बस स्टैंड था । रायपुर से निजि बस सेवा प्रारम्भ करने वालों में सप्रे ब्रदर्स, मोहन लाल व्यास का अच्छा योगदान रहा। उन दिनों रायपुर से धमतरी 4 घंटे में पहुँचते थे और टिकरापारा सेजबहार होकर सड़क धमतरी जाती थी । आज भी यह पुराना धमतरी रोड के नाम से जानी जाती है । 1945 में रायपुर से राजनांदगाँव के रेल टिकिट 1 रुपये की थी - आधी टिकिट आठ आने की दुर्ग तक पूरी टिकिट बारह आने और धमतरी तक एक रूपया - 12 साल तक के बच्चे के आधी टिकट लगती थी ।
    कलेक्टर ऑफिस के प्रांगण में महारानी विक्टोरिया और जार्ज पंचम की संगमरमर की मूर्तियां लगी थी । महाकोशल कला वीथिका म्यूजियम था । आज का डी. के. हास्पीटल सिलवर जुबली अस्पताल कहलाता था और उसके वहाँ किनारे सीताफल के झाड़ लगाए गाए थे जो बाँड्री का काम करते थे - सामने बाद में जजकी अस्पताल बना दोनों के बीच की सड़क मुरम की थी। एक समय के फिल्मों के प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता डेविड के बड़े भाई कुछ समय सिविल हास्पीटल में सिविल सर्जन रहे ।
स्टेशन की ओर जाने वाली सड़क पर राष्ट्रीय स्कूल के किनारे गंगा इमली के झाड़ थे - राष्ट्रीय स्कूल की स्थापना 5 फरवरी 1921 को की गई और यहाँ हिन्दू अनाथालय (बाद में बाल आश्रम 1923 में) स्थापित हुआ ।
जारी....