Thursday, October 11, 2018

विकल्प विमर्श फेसबुक एडीशन 11 वीं कड़ी - जयशंकर प्रसाद की कहानी -मधुआ


जयशंकर प्रसाद ( 30 जनवरी 1889- 15 नवंबर 1937)- जय शंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य के अप्रतिम रचनाकार हैं। हिंदी की खड़ी बोली में नाटक लेखन की शुरुआत भले ही भारतेंदु हरिश्चंद्र ने की थी, लेकिन खड़ी बोली में बेहतरीन कविताएं भी लिखी जा सकती हैं, इसे सबसे पहले जयशंकर प्रसाद ने साबित किया. 1925 में प्रकाशित 'आंसू' को खड़ी बोली कविता की पहली महान रचना माना जाता है. प्रसाद की भाषा में शाब्दिक अर्थ और ध्वनि का अद्भुत तालमेल हर जगह नजर आता है । वो कामायनी हो या कोई और रचना. कामायनी को तो सुमित्रानंदन पंत ने 'हिंदी का ताजमहल' कहा था.
प्रमुख कृतियां-
काव्य : झरना, आँसू, लहर, कामायनी, प्रेम पथिक
कहानी संग्रह : छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इंद्रजाल
उपन्यास : कंकाल, तितली, इरावती
नाटक : स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जन्मेजय का नाग यज्ञ, राज्यश्री, अजातशत्रु, विशाख, एक घूँट, कामना, करुणालय, कल्याणी परिणय, अग्निमित्र, प्रायश्चित, सज्जन
आज पढ़ते हैं उनकी कहानी-
 
मधुआ 
जयशंकर प्रसाद
 
आज सात दिन हो गये, पीने को कौन कहे-छुआ तक नहीं! आज सातवाँ दिन है, सरकार!
तुम झूठे हो। अभी तो तुम्हारे कपड़े से महँक आ रही है।
वह ... वह तो कई दिन हुए। सात दिन से ऊपर-कई दिन हुए-अन्धेरे में बोतल उँड़ेलने लगा था। कपड़े पर गिर जाने से नशा भी न आया। और आपको कहने का....क्या कहूँ .... सच मानिए। सात दिन-ठीक सात दिन से एक बूँद भी नहीं।
ठाकुर सरदार सिंह हँसने लगे। लखनऊ में लडक़ा पढ़ता था। ठाकुर साहब भी कभी-कभी वहीं आ जाते। उनको कहानी सुनने का चसका था। खोजने पर यही शराबी मिला। वह रात को, दोपहर में, कभी-कभी सवेरे भी आता। अपनी लच्छेदार कहानी सुनाकर ठाकुर साहब का मनो-विनोद करता।
ठाकुर ने हँसते हुए कहा-तो आज पियोगे न!
झूठ कैसे कहूँ। आज तो जितना मिलेगा, सब पिऊँगा। सात दिन चने-चबेने पर बिताये हैं, किसलिए।
अद्‌भुत! सात दिन पेट काटकर आज अच्छा भोजन न करके तुम्हें पीने की सूझी! यह भी...
सरकार! मौज-बहार की एक घड़ी, एक लम्बे दु:खपूर्ण जीवन से अच्छी है। उसकी खुमारी में रूखे दिन काट लिये जा सकते हैं।
अच्छा, आज दिन भर तुमने क्या-क्या किया है?
मैंने?-अच्छा सुनिये-सवेरे कुहरा पड़ता था, मेरे धुँआ से कम्बल-सा वह भी सूर्य के चारों ओर लिपटा था। हम दोनों मुँह छिपाये पड़े थे।
ठाकुर साहब ने हँसकर कहा-अच्छा, तो इस मुँह छिपाने का कोई कारण?
सात दिन से एक बूँद भी गले न उतरी थी। भला मैं कैसे मुँह दिखा सकता था! और जब बारह बजे धूप निकली, तो फिर लाचारी थी! उठा, हाथ-मुँह धोने में जो दु:ख हुआ, सरकार, वह क्या कहने की बात है! पास में पैसे बचे थे। चना चबाने से दाँत भाग रहे थे। कट-कटी लग रही थी। पराठेवाले के यहाँ पहुँचा, धीरे-धीरे खाता रहा और अपने को सेंकता भी रहा। फिर गोमती किनारे चला गया! घूमते-घूमते अँधेरा हो गया, बूँदें पड़ने लगीं, तब कहीं भाग के आपके पास आ गया।
अच्छा, जो उस दिन तुमने गड़रियेवाली कहानी सुनाई थी, जिसमें आसफुद्दौला ने उसकी लडक़ी का आँचल भुने हुए भुट्टे के दाने के बदले मोतियों से भर दिया था! वह क्या सच है?
सच! अरे, वह गरीब लडक़ी भूख से उसे चबाकर थू-थू करने लगी! ... रोने लगी! ऐसी निर्दयी दिल्लगी बड़े लोग कर ही बैठते हैं। सुना है श्री रामचन्द्र ने भी हनुमान जी से ऐसा ही ...
ठाकुर साहब ठठाकर हँसने लगे। पेट पकड़कर हँसते-हँसते लोट गये। साँस बटोरते हुए सम्हलकर बोले-और बड़प्पन कहते किसे हैं? कंगाल तो कंगाल! गधी लडक़ी! भला उसने कभी मोती देखे थे, चबाने लगी होगी। मैं सच कहता हूँ, आज तक तुमने जितनी कहानियाँ सुनाई, सब में बड़ी टीस थी। शाहजादों के दुखड़े, रंग-महल की अभागिनी बेगमों के निष्फल प्रेम, करुण कथा और पीड़ा से भरी हुई कहानियाँ ही तुम्हें आती हैं; पर ऐसी हँसाने वाली कहानी और सुनाओ, तो मैं अपने सामने ही बढिय़ा शराब पिला सकता हूँ।
सरकार! बूढ़ों से सुने हुए वे नवाबी के सोने-से दिन, अमीरों की रंग-रेलियाँ, दुखियों की दर्द-भरी आहें, रंगमहलों में घुल-घुल कर मरनेवाली बेगमें, अपने-आप सिर में चक्कर काटती रहती हैं। मैं उनकी पीड़ा से रोने लगता हूँ। अमीर कंगाल हो जाते हैं। बड़े-बड़ों के घमण्ड चूर होकर धूल में मिल जाते हैं। तब भी दुनियाँ बड़ी पागल है। मैं उसके पागलपन को भुलाने के लिए शराब पीने लगता हूँ-सरकार! नहीं तो यह बुरी बला कौन अपने गले लगाता!
ठाकुर साहब ऊँघने लगे थे। अँगीठी में कोयला दहक रहा था। शराबी सरदी से ठिठुरा जा रहा था। वह हाथ सेंकने लगा। सहसा नींद से चौंककर ठाकुर साहब ने कहा-अच्छा जाओ, मुझे नींद लग रही है। वह देखो, एक रुपया पड़ा है, उठा लो। लल्लू को भेजते जाओ।
शराबी रुपया उठाकर धीरे से खिसका। लल्लू था ठाकुर साहब का जमादार। उसे खोजते हुए जब वह फाटक पर की बगलवाली कोठरी के पास पहुँचा, तो सुकुमार कण्ठ से सिसकने का शब्द सुनाई पड़ा। वह खड़ा होकर सुनने लगा।
तो सूअर, रोता क्यों है? कुँवर साहब ने दो ही लातें लगाई हैं! कुछ गोली तो नहीं मार दी? कर्कश स्वर से लल्लू बोल रहा था; किन्तु उत्तर में सिसकियों के साथ एकाध हिचकी ही सुनाई पड़ जाती थी। अब और भी कठोरता से लल्लू ने कहा-मधुआ! जा सो रह, नखरा न कर, नहीं तो उठूँगा तो खाल उधेड़ दूँगा! समझा न?
शराबी चुपचाप सुन रहा था। बालक की सिसकी और बढऩे लगी। फिर उसे सुनाई पड़ा-ले, अब भागता है कि नहीं? क्यों मार खाने पर तुला है?
भयभीत बालक बाहर चला आ रहा था! शराबी ने उसके छोटे से सुन्दर गोरे मुँह को देखा। आँसू की बूँदें ढुलक रही थीं। बड़े दुलार से उसका मुँह पोंछते हुए उसे लेकर वह फाटक के बाहर चला आया। दस बज रहे थे। कड़ाके की सर्दी थी। दोनों चुपचाप चलने लगे। शराबी की मौन सहानुभूति को उस छोटे-से सरल हृदय ने स्वीकार कर लिया। वह चुप हो गया। अभी वह एक तंग गली पर रुका ही था कि बालक के फिर से सिसकने की उसे आहट लगी। वह झिड़ककर बोल उठा-
अब क्या रोता है रे छोकरे?
मैंने दिन भर से कुछ खाया नहीं।
कुछ खाया नहीं; इतने बड़े अमीर के यहाँ रहता है और दिन भर तुझे खाने को नहीं मिला?
यही कहने तो मैं गया था जमादार के पास; मार तो रोज ही खाता हूँ। आज तो खाना ही नहीं मिला। कुँवर साहब का ओवरकोट लिए खेल में दिन भर साथ रहा। सात बजे लौटा, तो और भी नौ बजे तक कुछ काम करना पड़ा। आटा रख नहीं सका था। रोटी बनती तो कैसे! जमादार से कहने गया था! भूख की बात कहते-कहते बालक के ऊपर उसकी दीनता और भूख ने एक साथ ही जैसे आक्रमण कर दिया, वह फिर हिचकियाँ लेने लगा।
शराबी उसका हाथ पकड़कर घसीटता हुआ गली में ले चला। एक गन्दी कोठरी का दरवाजा ढकेलकर बालक को लिए हुए वह भीतर पहुँचा। टटोलते हुए सलाई से मिट्टी की ढेबरी जलाकर वह फटे कम्बल के नीचे से कुछ खोजने लगा। एक पराठे का टुकड़ा मिला! शराबी उसे बालक के हाथ में देकर बोला-तब तक तू इसे चबा, मैं तेरा गढ़ा भरने के लिए कुछ और ले आऊँ-सुनता है रे छोकरे! रोना मत, रोयेगा तो खूब पीटूँगा। मुझसे रोने से बड़ा बैर है। पाजी कहीं का, मुझे भी रुलाने का....
शराबी गली के बाहर भागा। उसके हाथ में एक रुपया था। बारह आने का एक देशी अद्धा और दो आने की चाय....दो आने की पकौड़ी... नहीं-नहीं, आलू-मटर...अच्छा, न सही, चारों आने का मांस ही ले लूँगा, पर यह छोकरा! इसका गढ़ा जो भरना होगा, यह कितना खायगा और क्या खायेगा। ओह! आज तक तो कभी मैंने दूसरों के खाने का सोच-विचार किया ही नहीं। तो क्या ले चलूँ?-पहले एक अद्धा तो ले लूँ। इतना सोचते-सोचते उसकी आँखों पर बिजली के प्रकाश की झलक पड़ी। उसने अपने को मिठाई की दूकान पर खड़ा पाया। वह शराब का अद्धा लेना भूलकर मिठाई-पूरी खरीदने लगा। नमकीन लेना भी न भूला। पूरा एक रुपये का सामान लेकर वह दूकान से हटा। जल्द पहुँचने के लिए एक तरह से दौड़ने लगा। अपनी कोठरी में पहुँचकर उसने दोनों की पाँत बालक के सामने सजा दी। उनकी सुगन्ध से बालक के गले में एक तरावट पहुँची। वह मुस्कराने लगा।
शराबी ने मिट्टी की गगरी से पानी उँड़ेलते हुए कहा-नटखट कहीं का, हँसता है, सोंधी बास नाक में पहुँची न! ले खूब, ठूँसकर खा ले, और फिर रोया कि पीटा!
दोनों ने, बहुत दिन पर मिलनेवाले दो मित्रों की तरह साथ बैठकर भरपेट खाया। सीली जगह में सोते हुए बालक ने शराबी का पुराना बड़ा कोट ओढ़ लिया था। जब उसे नींद आ गई, तो शराबी भी कम्बल तानकर बड़बड़ाने लगा। सोचा था, आज सात दिन पर भरपेट पीकर सोऊँगा, लेकिन यह छोटा-सा रोना पाजी, न जाने कहाँ से आ धमका?
एक चिन्तापूर्ण आलोक में आज पहले पहल शराबी ने आँख खोलकर कोठरी में बिखरी हुई दारिद्रय की विभूति को देखा और देखा उस घुटनों से ठुड्डी लगाये हुए निरीह बालक को; उसने तिलमिलाकर मन-ही-मन प्रश्न किया-किसने ऐसे सुकुमार फूल को कष्ट देने के लिए निर्दयता की सृष्टि की? आह री नियति! तब इसको लेकर मुझे घर-बारी बनना पड़ेगा क्या? दुर्भाग्य! जिसे मैंने कभी सोचा भी न था। मेरी इतनी माया-ममता-जिस पर, आज तक केवल बोतल का ही पूरा अधिकार था-इसका पक्ष क्यों लेने लगी? इस छोटे-से पाजी ने मेरे जीवन के लिए कौन-सा इन्द्रजाल रचने का बीड़ा उठाया है? तब क्या करूँ? कोई काम करूँ? कैसे दोनों का पेट चलेगा? नहीं, भगा दूँगा इसे-आँख तो खोले?
बालक अँगड़ाई ले रहा था। वह उठ बैठा। शराबी ने कहा-ले उठ, कुछ खा ले, अभी रात का बचा हुआ है; और अपनी राह देख! तेरा नाम क्या है रे?
बालक ने सहज हँसी हँसकर कहा-मधुआ! भला हाथ-मुँह भी न धोऊँ। खाने लगूँ? और जाऊँगा कहाँ?
आह! कहाँ बताऊँ इसे कि चला जाय! कह दूँ कि भाड़ में जा; किन्तु वह आज तक दु:ख की भठ्ठी में जलता ही तो रहा है। तो... वह चुपचाप घर से झल्लाकर सोचता हुआ निकला-ले पाजी, अब यहाँ लौटूँगा ही नहीं। तू ही इस कोठरी में रह!
शराबी घर से निकला। गोमती-किनारे पहुँचने पर उसे स्मरण हुआ कि वह कितनी ही बातें सोचता आ रहा था, पर कुछ भी सोच न सका। हाथ-मुँह धोने में लगा। उजली धूप निकल आई थी। वह चुपचाप गोमती की धारा को देख रहा था। धूप की गरमी से सुखी होकर वह चिन्ता भुलाने का प्रयत्न कर रहा था कि किसी ने पुकारा-
भले आदमी रहे कहाँ? सालों पर दिखाई पड़े। तुमको खोजते-खोजते मैं थक गया।
शराबी ने चौंककर देखा। वह कोई जान-पहचान का तो मालूम होता था; पर कौन है, यह ठीक-ठीक न जान सका।
उसने फिर कहा-तुम्हीं से कह रहे हैं। सुनते हो, उठा ले जाओ अपनी सान धरने की कल, नहीं तो सड़क पर फेंक दूँगा। एक ही तो कोठरी, जिसका मैं दो रुपये किराया देता हूँ, उसमें क्या मुझे अपना कुछ रखने के लिए नहीं है?
ओहो? रामजी, तुम हो भाई, मैं भूल गया था। तो चलो, आज ही उसे उठा लाता हूँ।-कहते हुए शराबी ने सोचा-अच्छी रही, उसी को बेचकर कुछ दिनों तक काम चलेगा।
गोमती नहाकर, रामजी, पास ही अपने घर पर पहुँचा। शराबी की कल देते हुए उसने कहा-ले जाओ, किसी तरह मेरा इससे पिण्ड छूटे।
बहुत दिनों पर आज उसको कल ढोना पड़ा। किसी तरह अपनी कोठरी में पहुँचकर उसने देखा कि बालक बैठा है। बड़बड़ाते हुए उसने पूछा-क्यों रे, तूने कुछ खा लिया कि नहीं? भर-पेट खा चुका हूँ, और वह देखो तुम्हारे लिए भी रख दिया है। कह कर उसने अपनी स्वाभाविक मधुर हँसी से उस रूखी कोठरी को तर कर दिया। शराबी एक क्षण चुप रहा। फिर चुपचाप जल-पान करने लगा। मन-ही-मन सोच रहा था-यह भाग्य का संकेत नहीं, तो और क्या है? चलूँ फिर सान देने का काम चलता करूँ। दोनों का पेट भरेगा। वही पुराना चरखा फिर सिर पड़ा। नहीं तो, दो बातें किस्सा-कहानी इधर-उधर की कहकर अपना काम चला ही लेता था? पर अब तो बिना कुछ किये घर नहीं चलने का। जल पीकर बोला-क्यों रे मधुआ, अब तू कहाँ जायगा?
कहीं नहीं।
यह लो, तो फिर क्या यहाँ जमा गड़ी है कि मैं खोद-खोद कर तुझे मिठाई खिलाता रहूँगा।
तब कोई काम करना चाहिए।
करेगा?
जो कहो?
अच्छा, तो आज से मेरे साथ-साथ घूमना पड़ेगा। यह कल तेरे लिये लाया हूँ! चल, आज से तुझे सान देना सिखाऊँगा। कहाँ, इसका कुछ ठीक नहीं। पेड़ के नीचे रात बिता सकेगा न!
कहीं भी रह सकूँगा; पर उस ठाकुर की नौकरी न कर सकूँगा?-शराबी ने एक बार स्थिर दृष्टि से उसे देखा। बालक की आँखे दृढ़ निश्चय की सौगन्ध खा रही थीं।
शराबी ने मन-ही-मन कहा-बैठे-बैठाये यह हत्या कहाँ से लगी? अब तो शराब न पीने की मुझे भी सौगन्ध लेनी पड़ी।
वह साथ ले जानेवाली वस्तुओं को बटोरने लगा। एक गट्ठर का और दूसरा कल का, दो बोझ हुए।
शराबी ने पूछा-तू किसे उठायेगा?
जिसे कहो।
अच्छा, तेरा बाप जो मुझको पकड़े तो?
कोई नहीं पकड़ेगा, चलो भी। मेरे बाप कभी मर गये।
शराबी आश्चर्य से उसका मुँह देखता हुआ कल उठाकर खड़ा हो गया। बालक ने गठरी लादी। दोनों कोठरी छोड़ कर चल पड़े।

Saturday, September 8, 2018

आज पढ़ते हैं -मुक्तिबोध का लेख-

डबरे पर सूरज का बिम्ब

(एक साहित्यिक की डायरी से) 

जब उससे मैं सड़क पर मिला, मुझे लगा कि वह ठीक बात करने के मूड में नहीं है। राह में मुझे देखकर वह खुश नहीं हुआ था। उसकी शर्ट की पीठ पसीने से तर-बतर थी, बाल अस्त-व्यस्त थे। और चेहरा ऐसा मलिन और क्लान्त था मानो सौ जूते खाकर सवारी आ रही हो। तत्काल निर्णय लिया कि वह सरकारी दफतर से लौट रहा है, कि वह पैदल आ रहा है,कि वह वहा अहलकार की किसी ऊंची या नीची साहित्यिक या राजनीतिक श्रेणी का ही एक हिस्सा है, वह मुझे फस्र्ट क्लास सूट-बूट में देख सिर्फ आगे बढ़ जाना चाहता है, क्योंकि वह बगल में खड़ा होकर, कॅण्ट्रास्ट खड़ा नहीं करना चाहता।

पुराने जमाने में भूखे व्यक्ति को अन्न देने से जितना पुण्य लगता था, आधुनिक काल मे शायद उससे भी अधिक पुण्य श्रम से मलिन और थके हुए व्यक्ति को एक कप गरम-गरम चाय प्रदान करते हुए दो मीठी बातें करने से लग जाना चाहिए। मेरे इस तर्क का आधार यहा है कि आज-कल सच्चा श्रम, जिससे चेहरा सूख जाता है, पसीना आता है, कपड़ों की इस्तिरी बिगड़ जाती हैं, ओछे हुए बाल असत-व्यस्त हो जाते हैं, उँगलियों को स्याही लग जाती है, आँखें कमजोर हो जाती हैं, अपने से बड़े पदाधिकारियों के मारे दिल धक-धक करता है। मतलब कह कि कम से कम मानवोचित सुविधाओं में अधिक से अधिक से श्रम की मनुष्यमूर्ति-दुनिया को तो छोड़ ही दीजिए - अपने भाइयों की, उनकी आँखों में भी हजार सहानुभूतियों के बावजूद, सूक्ष्म और स्थूल अनादार की पात्र है, असम्मान की पात्र है। टैªजडी तो यह है कि ऐसी मनुष्य-मूर्ति अपने स्वयं की आँखो में भी अनादर और सम्मान की ही पात्र होती है। इस विश्व-व्यापी और अन्तर्यामी अनादार और असम्मान की धूल धारण कर, हृदय में बासी कडु़आ जहर लिये हुए थके, क्लान्त और श्रमित व्यक्ति जब अपने दफ्तरों से बाहर दो मील दूर अपने घर की तरफ लुढ़कते-पुढ़कते निकलते हैं तो उनके मन में और हमारे मन में श्रम का कितना महान् आध्यात्मिक मूल्य अवतरित होता है, वह वर्णनातीत है !

इस तिराहे पर खड़े होकर, मुझे उस व्यक्ति की जरूरत महसूस हुई। वह मेरा परिचित था। आखिर, जब मैं इस कोने में अकेला खड़ा हू तो वह मुझसे बातचीत तो कर ही सकता था। मुझे लगता था कि जब तक मैं अपनी बकवास पूरी नहीं कर लूगा मुझे चैन न मिलेगी।

मैं पान चबा रहा था। सुर्खरू था। ऐसे मौके पर मनुष्य स्वभावतः बुद्धिमान हो जाता है। उसमें आत्म-विश्वास की तेजस्विता रहती है- वह क्षण-स्थायी ही क्यों न हो । वह आशावादी होता है। ह नसीहत दे सकता है। वह दूर-दृष्टा होता है, चाहे तो पैगम्बर हो सकता है, चाहे तो वह रोमैण्टिक प्रेमी बन सकता है। वाह-वाह ! सुर्खरूपन, तेरा क्या कहना ! बिना श्रम के जो प्राप्ति होती है, उपलब्धि होती है, वही तू है ! पल-भर मैं संकोच की गटर-गंगा में डूब गया। मैं रीअली (सचमुच) फस्र्ट क्लास कपड़े पहने था। बेहतरीन सूट। मैं गया था शहर के ऊँचे दरजे के कुछ लोगों से मिलने। वहाँ या तो महँगी किस्म के खदी के कपड़े चलते थे या ये कपड़े। आजकल मै। आधा बेकार हूँ। अपने ही घर में शरणार्थी हूँ। लिहाजा, कुछ बड़े आदमियों के यहाँ जाकर, एक असिस्टेण्ट डायरेक्टर के पद ( वह जगह अभी खाली नहीं हुई थी, लेकिन सुना था कि होनवाली थी) के लिए कोशिश कर रहा था।और ज्यों ही आप ऐसे कपड़े पहन लेते हैं, अपने धुले-पुँछेपन को स्वास्थ्य की संवेदना मानते हुए( थोड़ी देर के लिए ही क्यों न सही) अपने को 'बाश्शा' अनुभव करते हैं ! गौरव और गरिमा की यह संवेदना !! तेरा नाम सत्य है, तेरा नाम शिव है, तेरा नाम है सौनदर्य ! लेकिन शहर के उस फैशनेबल मुहल्ले के अपने आत्मीयों से लौटकर मुझे आकसिमक यह भावना हुई कि मैं अकेला हूँ, कि अपनी असली श्रेणी के साथी के साथ बैठकर ही मैं अपने आनन्द का वितरण और उपभोग कर सकूँगा। और इसी अन्तःप्रवृत्ति के अन्दरूनी धक्के के फलस्वरूप मैं आॅफिस से लौटते हुए उस व्यक्ति को आमन्त्रण दे बैठा।

लेकिन ज्यों ही मैं उसके साथ चाय पीने लगा, हम दोनों के बीच एक जहरीली चुप्पी की रेख दूरी का माप-छण्ड बनने की कोशिश करने लगी। मैंने उदारता की पराकाष्ठा करते हुए एसके लिए एक कप चाय और मँगवा दी !

मैं अपने शरीर पर पड़े हुए कपड़ों से लगातार सचेत था। ये वस्त्र ही हैं कि मुझे उससे दूर ठेले जा रहे थे ! इस संकोच को दूर हटाने के लिए मैंने कोट उतारकर रख दिया ! गरमी के बहाने शर्ट के बटन इस प्रकार खोल दिये कि अन्दर उलटी पहनी हुई जीर्ण-शीर्ण फटी बनियान लोगों की दिखाई दे सके !
मैं चाहता था कि वह मेरे अन्दरूनी नक्शे को देखे। लेकिन शायद वह अपनी धुन के धुँधलके में उड़ते हुए थके-हारे पंछी की भाँति नीड़ में समाना चाहता था। घर लौटना चाहता था।

मैं अपने को उससे एक गज ऊँचा अनुभव न करूँ और सच्ची मेहनत का शाप न झेल सकने के कारण उससे एक गज नीचा भी न अनुभव करूँ, इसलिए उसका जी खुश करके उसके साथ हँस बोल लेने के लिए मैंने उससे पूछा, “कल आल इण्डिया रेडियो से मैंने आपकी कहानी सुनी। बहुत अच्छी थी ! पढ़ी भी अच्छी गयी !“उसने मेरी तरफ ध्यान से देखा-यह जानने के लिए कि मेरा इरादा क्या हो सकता है। उसने प्रभुतावश कहा, अजी, आप तो बस आप तो आलोचक हैं,नुक्स बताइए! मैंने विश्वास दिलाया कि उसकी कहानी बहुत अच्छी थी, क्योंकि वह सचमुच बहुत अच्छी थी। लेकिन उसका जी नहीं भरा।उसने मेरी तरफ गौर से देखा। वह एक पतला-लम्बा चेहरा था। जरूरत से ज्यादा उंचा माथा-शयद आगे के बाल कम होने के कारण। मुझे ऐसे चेहरे पसन्द हैं। ऐसे लोगों में आप डूब सकते हैं और आपकी डुबकी को वे एन्जॅाय करने मजा लेने की ताकत रखते हैं । कम से कम मेरा खयाल है। मेरे द्वारा की गयी प्रशंसा के प्रति उसकी सन्देह की द्ष्टि मुझे बहुत-बहुत भायी। एक सच्चा लेखक जानता है कि वह कहां कमजोर है कि उसने कहां सच्चाई से जी चुराया है, कि उसने कहां लीपा-पोती कर डाली है, कि उसने कहां उलझा-चढ़ा दिया है, कि उसे वस्तुतः कहना क्या था और कह क्या गया है,कि उसकी अभिव्यक्ति कहां ठीक नहीं है।वह इसे बखूबी जानता है। क्योंकि वह लेखक सचेत है। सच्चा लेख्क अपनेखुद का दुश्मन होता है। वह अपनी आत्म-शान्ति को भंग करके ही लेखक बना रह सकता है। इसीलिए लेखक अपनी कसौटी पर दूसरों की प्रशंसा को भी कसता है और आलोचना को भी। वह अपने खुद का सबसे बड़ा आलोचक होता है।

बेचारा सर्वज्ञ शब्द-तत्पर आलोचक यह सब क्या जाने ! वह केवल वाह्य प्रभाव की दृष्टि से देखता है। आलोचक साहित्य का दारोगा है। माना कि दारोगापन बहुत बड़ा कर्तव्य है - साहित्य,संस्कृति,समाज ,विश्व तथाब्रह्माण्ड के प्रति। लेकिन मुश्किल यह है कि वह जितना उंचा उत्तरदायित्व सिर पर ले लेता है, अपने को उतना ही महान अनुभव करता है। और सच्चा लेखक जितनी बड़ी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले लेता है, स्वयं को उतना अधिक तुच्छ अनुभव करता है। उसे अपनी अक्षमता और आत्मसीमा का साक्षत् बोध होता रहता है। ऐसा क्यों? इसलिए कि अभिव्यक्ति की तुलना जी में धड़कनेवाले केवल वस्तु सत्य से ही नहीं करता, वरन् अपने स्वयें के साक्षात्कार सामर्थ्य की तुलना उस वस्तु-सत्य की विशालता से भी करता है। आत्म-सत्य भी कह सकते हैं उसे, जिसकी धारणा के लिए उसे लगता है कि जितनी आवश्यक मनःशक्ति उसमें चाहिए उतनी नहीं है। कभी-कभी तो उसे केतल आभास-संवेदन से ही काम चला लेना पड़ता है। तब अपनी विषय-वस्तु की विशालता और गहराई की तुलना में लेखक अपने को हीन क्यों न अनुभव करे ,जब कि वह खूब जानता है कि उसने जो कुछ वस्तुतः सम्पन्न किया है उससे भी अच्छा किया जा सकता था। विषय-वस्तु के प्रति लेखक का यह संवेदनात्मक उत्तरदायित्व,उसकी मनःशक्ति को किस तरह भंग किये रखता है,यह किसी सच्चे लेखक से ही जाना जा सकता है।

मैंने उस दुबले-पतले चेहरे के सन्देह-भाव को देखा और बात पलटने की दृष्टि से कहा, “यह जरूर है कि आपकी कहानी बहुत ज्यादा मनोवैज्ञानिक थी।"

उसने मुसकराकर जवाब दिया, "मनौवैज्ञानिक न होती तो क्या होती ! मन में ही घुलते और घुटते रहले के सिवा और क्या है जिन्दगी में ?"

मैंने उससे असहमति प्रकट करनी चाही। मैंने पूछा, तो क्या आप कुण्ठा को मनोवैज्ञानिकता की जननी मानते हैं।

"ककुण्ठा-वुण्ठा , मैं नहीं समझता, “उसने जवाब दिया, “हर जमाने में गरीबों की मुश्किल रही है हर जमाने में एक श्रेणी का दिल नहीं खुला है- बहुत विशाल श्रेणी का ,भारतीय जनता का ,मेहनतकश का।“ वह आगे कहता गया, “पिछला कौन-सा ऐसा युग था जिसमें कुण्ठा न हरी हो ?... और फिर...और फिर...कुण्ठा का मतलब क्या है ? उसने समझाते हुए कहा, कुण्ठा का आधिपत्य तो तब समझना चाहिए जब कुण्ठा के बुनियादी कारणों को दूर करने की बेसब्री और विक्षोभ न हो। हाँ, कुण्ठा का अगर फ्रॅायडवाद और मार्क्सवाद की संकर सन्तान है।

वह दुबला-पतला चेहरा मेरे सामने उठावदार और उभारदार हो गया, उसमें भव्य गरिमा प्रतिबिम्बित हो उठी। मुझे लगा-उसका दिमाग खुद-ब-खुद सोचता है। उस वयक्ति में मेरी दिलचस्प ज्यादा बढ़ गयी। मैं उसके विचारों को आदरपूर्वक सुनने लगा।उसने मुझे बोलने का अवसर न देते हुए कहा, “मैं तो सिर्फ मेहनत पर, अकारथ मेहनत पर, उस मेहनत पर जो अपना पेट भी नहीं भर सकती, उस मेहनत पर जो बहुत सज्जन है, उस सीन-शीनल श्रम पर लिखनेवाला हूँ, उस श्रम का चित्रण करना चाहता हूँ, जिसका बदला कभी नहीं मिलता और जिसे आये-दिन आत्मबलिदान और त्याग की नसीहत दी जाती है ! मैं उस भयानक मशीन का चित्रण करने वाली कहानी नहीं, बल्कि उपन्यास लिखने वाला हूँ, जिसमें हर आदमी वह नहीं है जो वह वस्तुतः है या होना चाहेगा। उसमें मशीन का दोष नहीं। मशीन चलानेवालों का गुरुतर अपराध है ! इस मशीन की लौह-नलियों में पडत्रे हुए मानती श्रम का मैं चित्रण करना चाहता हूँ ! कहिए, आपका क्या खयाल है ?

“मैंने ढाई मिनिट तक जैसे साँस ही नहीं ली। उसके भाव-विचार ने न केतल मुझे प्रभावित किया था, वरन् दिमाग पर दबाव डाल दिया था। मेरे सिर पर वजन हो गया था।

मैंने धीरे-धीरे कहा, “जरूर चित्रण कीजिए, जरूर लिखिए !

“क्यों, लेकिन आप चुप हो गये ! "

मैंने कहा, “चुप नहीं, मैं सोच रहा थ कि सिर्फ बहुत बड़ी थीम (विषय) उठा लेने से काम नहीं चलता। यह जरूरी है कि सिर्फ उतना ही अंश उठाया जाये जिसका मन पर अत्यधिक आघात हुआ हो। बड़ी भारी बिल्डिंग खड़ी करने को बजाय छोटी-सी कुटिया खड़ी की जाये तो अधिक अच्छा होगा।"

उसने कहा, “सही है। आसमान का चित्रण सधे न सधे, सामने के मैले डबरे में डबरे में सूरज के बिम्ब का चित्रण मुझसे सध भी जायेगा।“ उस व्यक्ति के इस वचन में आत्म-दया की हलकी-सी गूँज मुझे सुनाई दी।
मैंने बेरूखी से कहा, “इस आत्म-दया की जरूरत नहीं। एक सच्चे आर्टिस्ट का संघर्ष बहुत घुमावदार होता है ! हाँ, लेकिन भीतर सूरज का प्रतिबिम्ब धारण किये हैं। पूरा वस्तु-सत्य इस इमेज में आ गया है। इसीलिए पत्रवह महत्वपूर्ण है। हमारा परिश्रम भी तो थोड़ा नहीं है। हमारी साँस भी तो उखड़ी-उखड़ी है। डबरे हुए तो क्य हुआ, हैं तो प्रकृति-जन्य !"

एकाएक जैसे मैंने उसकी कमजोर रग पकड़ ली। उसमें आत्मविश्वास की कमी थी। जब सिर्फ सीना तानकर लोग खोटा माल खपा देते हैं और प्रभववादी होने के बहाने हर मामूली को गैर-मामूली बनाकर दुनिया के सामने उसे पेश करते हैं तो जो चीज सही और सच्ची है वह क्यों न ऐंठे ?

मैंने उससे कहा, “आजकल सच्चाई का सबसे बड़ा दुश्मन असत्य नहीं स्वयं सच्चाई ही है, क्योंकि वह ऐंठती नहीं, सज्जनता  को साथ लेकर चलती है। आजकल के जमाने में वह है आउट आफ डेट। जी ! उसलिए सत्य जरा युयुत्सु बने, वीर बने तभी वह धक सकता है, चल सकता है, बिक सकता है।"

वह और भी अप्रतिभ हो गया। किन्तु उसके चेहरे पर भीतर की खुशी का ज्यादा उजाला लाने के लिए मैंने उसे कहा, “बोल्डनेस हैज जीनियस ( औद्धत्य की अपनी प्रतीभा है)। गेटे का वाक्य है। मैं इसे उल्टा करके पढ़ता हूँ।“ मेरे कीमती कपड़ों के ठाठ ने मुझे कुछ उत्साहित तो कर ही दिया था (लेकिन क्या मैं सच कह रहा हूँ ?) जो हो ,हम दोनों जब बिदा हुए, बहुत दोस्त बनकर बिदा हुए।