Thursday, December 7, 2017

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से-4- शशि कपूर रायपुर में--- प्रभाकर चौबे

शशि कपूर रायपुर आए थे । इस बार प्रभाकर चौबे उन्हीं की स्मृति को साझा कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि हाल ही में मशहूर अभिनेता शशिकपूर का निधन हुआ । बहुत कम लोगों को पता होगा कि शशि कपूर रायपुर आए थे । निधन पर अखबारों या सोशल मीडिया  में भी   इस बात का ज़िक्र नहीं दिखा । इस बहाने उनकी स्मृति को साझा कर रहे हैं ।
              आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।
जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

        मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा थाखो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 4


पृथ्वीराज के साथ रायपुर आए थे शशि कपूरःप्रभाकर चौबे

हाल ही में मशहूर अभिनेता शशिकपूर का निधन हुआ । बहुत कम लोगों को पता होगा कि शशि कपूर रायपुर आए थे । निधन पर अखबारों या सोशल मीडिया  में भी   इस बात का ज़िक्र नहीं दिखा ।
शशि कपूर 1956 में पृथ्वीराज कपूर की नाटक मंडली पृथ्वी थिएटर के साथ    रायपुर आए थे। उनके साथ उनके भाई शम्मी कपूर भी थे । यह उल्लेखनीय है कि पृथ्वीराज कपूर उस ज़माने में अपनी नाटक मंडली पृथ्वी थिएटर के बैनर तले पूरे देश में नाटक किया करते थे । पठान, दीवार जैसे उनके प्रसिद्ध नाटक रहे जिसे वे देश भर में प्रदर्शन किया करते । यहां रायपुर में शारदा टॉकीज (बाद में इसका नाम जयराम टॉकीज हो गया) को सात दिनों के लिए बुक किया। वे रोज एक नाटक का प्रदर्शन करते। पृथ्वीराज कपूर के साथ उनके दो पुत्र शशि कपूर व शम्मी कपूर भी आए थे। बाद में शशि कपूर ने इसी पृथ्वी थिएटर के नाम पर मुंबई में प्रेक्षागृह की स्थापना की जो आज भी मुंबई में हिन्दी रंगमंच के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है ।
पृथ्वी राज अपनी टीम के साथ कांकेर बाड़ा (गोकुल चंद्रमा मार्ग), बुढ़ापारा में ठहरे थे। शम्मी कपूर और शशि कपूर दोनों रोज ही बूढा तालाब में तैरने जाते -जमकर तैरते और तैरते हुए बूढ़ा तालाब के टापू तक पहुंच जाते और वहां से घाट तक वापस आते दोनों भाईयों में मानो काम्पटीशन होता कि कौन पहले टापू तक पहुंचकर वापस घाट तक आता है। कुछ स्थानीय युवक भी उनके साथ शामिल हो जाते । तालाब के घाट पचरी में दर्शकों की भीड़ लगी रहती।
 पृथ्वी राज कपूर ने एक सप्ताह तक शो किया । सातो दिन उनके नाटक में भारी भीड़ रही।
सामने की टिकिट 5 रूपए का तथा बालकनी की 2 रूपए थी। एक और बात वे अपनी के साथ कांकेर बाड़ा से (जहां रूके थे) शारदा टॉकीज (प्रदर्शन स्थल) टांगे से आते-जाते।
यह भी उल्लेखनीय है कि नाटक के बीच सामने की सीट पर कोई व्यक्ति बात करते दिखता तो वे वहीं उसी सीन पर नाटक का प्रदर्शन रोक देते- कहते या तो आप बातें कर लीजिए या नाटक देख लीजिए, खलल न डालिए। नाटक खत्म होने के बाद वे शारदा टॉकीज के सामने गेट पर हाथ में कपड़ा फैलाकर खड़े हो जाते, आंखे बंद कर लेते लोग उसमें पैसे डालते।
पृथ्वीराज कपूर जहां ठहरे थे, कांकेर बाड़ा में, वहां किसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी। सामान्य नागरिक की तरह रूके । शहर में नाटक प्रेमी युवा उनसे बेरोकटोक मिलने जाते । उनसे मिलने का समय सुबह 7 बजे से 10 बजे तक का निर्धारित था। दोपहर को वे रिहर्सल करते।
इन्हीं सात दिनों के दौरान एक दिन उन्हें छत्तीसगढ़ कॉलेज के छात्रसंघ के पदाधिकारीयों को प्रमाण-पत्र देने हेतु आमंत्रित किया गया। आमंत्रण देने प्राचार्य श्री योगानंदन   गए थे।कार्यक्रम दोपहर एक बजे रखा गया था। छात्र संघ पदाधिकारियों को प्रमाण-पत्र देने के बाद उन्होंने नाटक पर काफी बातें की । छात्र-छात्राओं के प्रश्नों के उत्तर दिए ।
शशि कपूर के निधन पर ये बातें याद हो आईं। और इसलिए भी कि शहर वालों को ये पता चले ।
                                    ........ जारी

Saturday, December 2, 2017

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 3- - प्रभाकर चौबे

        रायपुर शहर एक छोटे से कस्बे से धीरे धीरे आज छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में लगातार विकसित हो रहा है । इत्तेफाक ये भी है कि इस वर्ष हम अपने नगर की पालिका का150 वॉ वर्ष भी मना रहे हैं ।
         हमारी पीढ़ी अपने शहर के पुराने दौर के बारे में लगभग अनभिज्ञ से हैं । वो दौर वो ज़माना जानने की उत्सुकता और या कहें नॉस्टेलजिया सा सभी को है । कुछ कुछ इधर उधर पढ़ने को मिल जाता है। सबसे दुखद यह है कि कुछ भी मुकम्मल तौर पर नहीं मिलता। 
        बड़े बुज़ुर्गों की यादों में एक अलग सा सुकूनभरा वो कस्बा ए रायपुर अभी भी जिंदा है । ज़रा सा छेड़ो तो यादों के झरोखे खुल जाते हैं और वे उन झरोखों से अपनी बीते हुए दिनों में घूमने निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में हम आप भी उनके सहयात्री बनकर उस गुज़रे जमाने की सैर कर सकते हैं।
   इसी बात को ध्यान में रखकर हम अपने शहर रायपुर को अपने बुज़ुर्गों की यादों के झरोखे से जानने का प्रयास कर रहे हैं । इस महती काम के लिए छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे अपनी यादों को हमारे साथ साझा करने राजी हुए हैं । वे  रायपुर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रहे हैं । एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कोई रायपुर का अकादमिक इतिहास नहीं है ये स्मृतियां हैं । जैसा श्री प्रभाकर चौबे जी ने रायपुर को जिया । एक जिंदा शहर में गुज़रे वो दिन और उन दिनों से जुड़े कुछ लोगघटनाएंभूगोलसमाज व कुछ कुछ राजनीति की यादें ।  और इस तरह गुजश्ता ज़माने की यादगार तस्वीरें जो शायद हमें हमारे अतीत का अहसास कराए और वर्तमान को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सके।
  आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।
जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

        मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा थाखो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 3

9 मई 1945 को रायपुर में जिलाधीश आफिस में गरीब महिलाओं को सड़िया बांटी गई - मेरे मौसा जी ने शाम को मौसी को बताते हुए कहा -'आज कलेक्टर आफिस में गरीब महिलाओं को साड़ी बाटी गई ।
मौसी ने पूछा था - आज क्या है 
मौसाजी ने बताया कि आज हिटलर के खिलाफ लड़ाई में मित्र राष्ट्र की सेना जीत गई हिटलर मारा गया इस खुशी में ।
मौसी ने पूछा था मतलब लड़ाई बंद ।
-- शायद, मौसाजी ने कहा था,
मैं मौसा जी के घर बढ़ई पारा में रहने आ गया था । बढ़ई पारा में एक बड़ा कुऑ था - वहाँ गर्मी के दिनों में नहाने जाया करता । कुऑ के पास पीपल का पेड़ था। एक दिन वहाँ एक आदमी पीपल की एक डाल पर उकरू बैठकर कुछ-कुछ बोलने लगा - नीचे झाड़ से  लगाकर एक चादर डाल दी थी । मौसिया जी ने बताया कि यह हरबोला है उधर की घटनाओं की जानकारी दे रहा है । वहाँ काफी लोग जमा हो गए थे । वह क्या बोल रहा है, मेरी समझ में आ नहीं रहा था । लोग नीचे उसकी बिछी चादर पर पैसे अनाज डाल रहे थे । घर आकर मौसिया जी ने बताया कि वह बता रहा था कि उधर 1942 में जमकर आंदोलन हुआ - जवान लड़कों ने टेलीफोन के तार काटे, रेल की पांत उखाड़ी - तिरंगा फहराया, धर-पकड़ हुई, लड़ाई बंद होने वाली है और उसने कहा भी है कि जिन्ना नाम का नेता पाकिस्तान माँग रहा है - मौसाजी  बुंदेलखंड से 1916 में आए थे इसलिए उसकी बात समझ रह थे ।
उसी साल स्कूल खुलते ही शहर में स्कूल के बच्चों का एक बड़ा जुलूस निकला शिक्षक भी साथ में नारे लगा रहे थे - गाँधी जी की जय । एक पैसा तेल में जिन्ना बेटा जेल में ...। जुलूस कलेक्टरेट में टाऊन हाल गया । वहाँ पुस्तकों की दुकाने लगी थीं एक बात उसी जूलुस में पता नहीं कैसे तो हिन्दू हाई स्कूल के एक छात्र का हाथ मेरे हाथ में आ गया हमने हाथ नहीं छुड़ाया - टाऊन हाल तक गए - उनका नाम बाबूलाल शुक्ला था - मुझसे तीन कक्षा आगे थे - बाद में वे कॉलेज में प्राध्यापक हुए और प्राचार्य भी - बाद तक उनसे भेंट होती रही । टाऊनहाल के पुस्तक मेला से मैंने एक कौमीतराना नाम की पुस्तक खरीदी थी - बाबूलाल जी ने भी ।
       इस जुलूस के एक हफ्ते बाद ही हमारे विद्यालय में हम छात्रों को मिठाईयाँ बांटी जाने लगी अचानक छात्रों का एक हुजूम चिल्लाते हुए स्कूल में पहुँचा - मत खाओ मिठाई । अंग्रेजों की जीत हमारी जीत नहीं है। फेक दो ...और हमने मिठाई का दोना फेंक दिया था। हमारे स्कूल में वे हाल के दीवारों पर कक्षा की दिवारों पर महारानी मेरी, महल की विक्टोरिया, जार्ज पंचम के चित्र लगे हुए थे ।
       उन दिनों रायपुर में चार हाई स्कूल थे - गवर्नमेट हाई स्कूल, हिन्दू हाई स्कूल, लारी (सप्रे) हाई स्कूल और सेंटपाल हाई स्कूल । लड़कियों  का सालेम हाई स्कूल था । मिडिल स्कूल राष्ट्रीय स्कूल (यह 1946 में हाई स्कूल में तब्दील हुआ । ए.वी.आई.एम. स्कूल (ए.बी.आई.एम) मतलब एन्लेट वर्नाकुलर इंडियन मिडिल स्कूल) प्राय: हर वार्ड में प्राथमिक विद्यालय थे जिसका संचालन नगर पालिका करती थी .. वार्ड के नाम से  स्कूल जाने जाते जैसे अमीनपारा प्राथमिक शाला, छोटापारा प्राथमिक शाला, नयापारा प्राथमिक शाला आदि... । प्रतिवर्ष इनका शहर में टुर्नामेंट होता ।

मिडिल व हाई स्कूल के लिये पहले शहर में प्रतियोगिता होती, फिर जिला, उसके बाद सम्भागीय टुर्नामेंट बालाघाट उन दिनों छत्तीसगढ़ कमिश्नरी का हिस्सा था । सम्भागीय टुर्नामेंट में तीन दिन की छुट्टी रहती, बच्चे टुर्नामेंट देखने जाते । शहर के लोग भी जाते । ए.वी.आई.एम. स्कूल के हेटमास्टर ज्ञानसिंह अग्निवंशी थे - स्वतंत्रता संग्रामी । वहाँ पाद्धे सर थे, वे गणेशउत्सव में नाटक प्रस्तुत करते - खुद भी बढ़िया गीतमय मिमिकरी करत पूरे शहर में फेमस थे
उन दिनों लारी (सप्रे) स्कूल और हिन्दूहाई स्कूल की सोशल गेदरिंग प्रसिद्ध थी - तीन दिनों की सोशल गेदरिंग होती । अंतराष्ट्रीय नाटय  कर्मी हबीब तनवीर लारी स्कूल में पढ़े थे । हिन्दू हाई स्कूल के हेडमास्टर मोहनलाल जी पांडे एक कड़क हेड मास्टर तथा सामाजिक सरोकार के लिये शहर में जाने जाते थे । शहर छोटा था चार ही हाई स्कूल थे इसलिये हर स्कूल के शिक्षक को पढ़ने वाले बच्चे जानते - पहचानते थे - रास्ते में दिख जाए तो - कहते अरे उधर से फलां  स्कूल के फला सर आ रहे हैं, उधर से नहीं इधर से चल ... । कॉलेज तो एक ही था - छत्तीसगढ़ कॉलेज के स्थापना वर्ष 1938 और प्राचार्य योगानंदनजी की अलग पहचान थी ... ।
गाँधी चौक कांग्रेस भवन के पीछे एक बाड़े में कन्या मिडिलि स्कूल चलता था । बाद में व स्कूल सुप्रिटेंडेन लेंड रिकार्ड ( गाँधी चौक लाखे स्कूल के नाम से ) के भवन में स्थानांतरित हो गयी और 1950 में दानी स्कूल खुलने पर भी दानी स्कूल के साथ मर्ज कर दिया गया । कांग्रेस भवन के पीछे बाड़ा में फिर पब्लिक  हाई स्कूल आ गया यह 1976 तक रहा । दानी स्कूल बूढ़ा गार्डन में भवन बनाकर खोला गया - गनपतराव दानी जी ने दान दिया था ।
बूढ़ा गार्डन था - यहाँ नागरिकों का प्रवेश प्रतिबंधित था । यह तरह-तरह के फूल होते । रोज इन फूलों  के
गुलदस्ते बनाकर माली कलेक्टर, कमिश्नर और पालिका आधिकारियों के बंगलों में पहुँचाता । बूढ़ा गार्डन बच्चों के आकर्षण का केन्द्र रहा क्योंकि यहाँ जाम, नीबू-इमली गंगा इमली, अटर्रा आदि लगते और छोटे बच्चे  किसी तरह घुसकर इन्हें तोड़ने के  जुगत करते - अंदर घुसते तो आल्हादित होते - लेकिन माली भगाता ... रोज शाम का ऐसा नजारा दिखता, मैं भी उनमें शामिल होता ... ।
उन दिनों गिने-चुने सेलून थे - प्राय: हर रविवार को बाल काटने घर पर ही नाई आता । सेलून में कटिंग के चार आने लगते थे - चेथी (सर का पीछे का भाग) सपाट चिकना कराना हो तो पाँच आने लगते थे । उन दिनों रायपुर में एक फैशन चला - कालर रखने और कालर का एक तरफ का हिस्सा उठाकर रखने की बढ़िया कड़क कलप कराई जाती .... उन दिनों एक कहावत चला थी -
वन कालर अप
एंड वन कालर डाऊन
इट इज ए फैशन ऑफ रायपुर टाऊन ...  
ज्यादा दिन चला नहीं यह फैशन लोगों ने स्वीकार नहीं किया शायद सालभर चला हो ।
(.....जारी)


Wednesday, September 6, 2017

प्रखर आलोचक वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या लोकतांत्रिक मूल्यों पर फासीवादी हमला है

      वरिष्ठ पत्रकार गौरी शंकर लंकेश की हत्या अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक बर्बर हमले के साथ ही लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने के लिए फासीवादी ताकतों द्वारा की गई  कायराना हत्या है । गौरी शंकर लंकेश ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया । कर्नाटक में सांप्रदायिकता व कट्टरपंथ  के खिलाफ अपने सख्त रुख के लिए लंकेश की व्यापक पहचान रही है।
गौरी लंकेश 'लंकेश पत्रिके' नाम के साप्ताहिक अखबार की संपादक थीं, जिसका साप्ताहिक वितरण 70 हजार था। यह अखबार उनके पिता पाल्याड़ा लंकेश ने शुरू किया था। पाल्याड़ा लंकेश फिल्ममेकर, कवि और पत्रकार थे। अखबार की ख्याति खोजी रपट प्रकाशित करने में थी।  इसके साथ ही वह कई टीवी चैनलों पर पैनेलिस्ट भी थीं। वह सामाजिकराजनीतिक सवालों को लेकर एक कर्मठ कार्यकर्ता की तरह सक्रिय रहती थीं। गौरी लंकेश नौ घंटे पहले तक ट्वीटर पर सक्रिय थीं और उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों की असुरक्षा और उनके द्वारा झेली जा रही हिंसा के संदर्भ में छपी खबर को आखिरी ट्वीट किया था।
इसके पूर्व बेंगलुरु में ही हिंदुत्वादियों ने साहित्य अकादमी विजेता लेखक एम एम कलबूर्गी की भी हत्या कर दी थी। इसी प्रकार पानसारे व दाभोलकर की भी निर्मम हत्या कर दी गई थी ।  'पहले दाभोलकर, कलबुर्गी, फिर पानसरे और अब गौरी लंकेश, कट्टरपंथी व फासिस्ट ताकतों द्वारा एक एक करके स्वतंत्र विचारों वाले तर्कशील लोगों की हत्या कर दी जा रही है । यह स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है कि  बहुत ही सोची समझी साजिश के तहत ऐसे तर्कशील लोगों को फासिस्ट ताकतों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है मगर राज्य व केन्द्र सरकार कुछ ठोस कार्यवाही नहीं कर पा रही है ।
वरिष्ठ पत्रकार लंकेश के भाई इंद्रजीत ने मांग की है कि लंकेश की हत्या जांच सीबीआई से होनी चाहिए, क्योंकि राज्य सरकार की जांच में दोषियों को सजा नहीं मिल पाएगी। उन्होंने सीबीआई की जांच इसलिए भी मांगी क्योंकि उन पर कई मानहानी के मुकदमें हैं जो माफियाओं और नेताओं ने किए हैं।
यह माना जाना चाहिए कि  दाभोलकर , कुलबुर्गी , पनसारे की हत्याओं की यह अगली कड़ी है, केन्द्र और राज्य सरकारें लेखकों, बुद्धिजीवियों की ज़ुबांन बंद करने की चाह में लगातार हो रही हत्याओं पर ख़मोश हैं । आज तक हुई ऐसी हत्याओं पर कोई कारगर कार्यवाही अथवा ठोस कदम नही उठाये गए हैं।लोकतांत्रिक समाज व राष्ट्र मे वैचारिक मत भिन्नता को सम्मानजनक स्थान मिलने की बजाय दमनात्मक रवैया अपनाकर बर्बर हत्या की हम निंदा करते हैं । लोकतांत्रिक मूल्यों को मानने वाले सभी प्रगतिशील व तर्कशील लोगों से इस हत्या एवं इसके पूर्व हुई सभी हत्याओं के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करने हेतु आगे आने की अपील भी करते हैं ।


जीवेश प्रभाकर

Thursday, August 24, 2017

अकार-47 में : गेर्निका होता समय- अशोक भौमिक

जब प्रेम, शांति और सहिष्णुता के संभव होने पर विश्वास टूटने लगे, जब घृणा, क्रूरता, असत्य और रक्त का उन्मादस्वीकृति पाकर विजयी या निर्णायक होने लगे, तब रचनाकार के अंदर की रचनात्मकता टूटना शुरु होती है । एक रचनाकार के लिये ये संकट और संघर्ष के क्षण होते हैं । चारों ओर हिंसक फुसफुसाहटों से भरे वातावरण में वह अपने रचनाकार की अप्रत्यक्ष हत्या किए जाने को महसूस करता है । नतीजे में सबसे पहले तो वह इसको चुप और हैरतज़दा होकर अविश्वास से देखता है, फिर इसके विरुद्ध चीखता है। यह चीख अक्सर दोधारी होती है। अगर रचना के रुप में सार्र्थकता के साथ बाहर नहीं निकली, तो अंदर ही अंदर रचनाकार को छीलती रहती है । पर अगर पूरी शक्ति से बाहर निकल सकी, तो इन विनाशक व अमानवीय शक्तियों के विरुद्ध सबसे बड़ा वक्तव्य बन जाती है । पिकासो का कालजयी चित्र 'गेर्निका', युद्ध और हिंसा के क्रूर उन्माद के विरुद्ध ऐसी ही एक चीख है ।


       जुलाई 1937 में यह चित्र पहली बार पेरिस की अंतराष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शित हुआ था । संयोग है कि यह वर्ष 'गेर्निका' का 80वां जयन्ती वर्ष है और समय भी फिर उतना ही क्रूर और आशंकित करने वाला हो चला है। 'गेर्निका' अनायास ही हमारे लिये एक बार फिर प्रासंगिक हो रहा है। हम अशोक भौमिक के आभारी हैं कि उन्होंने हमारे अनुरोध पर इस चित्र को केन्द्र में रखकर उन्मादी और निरंकुश सत्ताओं के विरूद्ध चित्रों में दर्ज़ चीखों को इस लेख में शब्दों की शक्ल में उतारा है । बहुत श्रम से उन्होंने अनेक चित्रों को संयोजित व व्याख्यायित कर हमारे पाठकों के लिये उन्हें उपलब्ध कराया है । इस अंक के मुख पृष्ठ तथा अंदर के दोनों रंगीन चित्र भी अशोक जी द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं । अशोक जी के प्रति पुन: आभार प्रकट करते हुए, 'गेर्निका' के अस्सीवें जन्म वर्ष पर उसकी वर्तमान प्रासंगिकता को रेखांकित करने वाली इस व्याख्या को हम पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं । (प्रियंवद.)
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Thursday, August 17, 2017

रायपुर स्मृतियों के झरोखे से- 2- - प्रभाकर चौबे

        रायपुर शहर एक छोटे से कस्बे से धीरे धीरे आज छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में लगातार विकसित हो रहा है । इत्तेफाक ये भी है कि इस वर्ष हम अपने नगर की पालिका का150 वॉ वर्ष भी मना रहे हैं ।
         हमारी पीढ़ी अपने शहर के पुराने दौर के बारे में लगभग अनभिज्ञ से हैं । वो दौर वो ज़माना जानने की उत्सुकता और या कहें नॉस्टेलजिया सा सभी को है । कुछ कुछ इधर उधर पढ़ने को मिल जाता है । सबसे दुखद यह है कि कुछ भी मुकम्मल तौर पर नहीं मिलता। 
        बड़े बुज़ुर्गों की यादों में एक अलग सा सुकूनभरा वो कस्बा ए रायपुर अभी भी जिंदा है । ज़रा सा छेड़ो तो यादों के झरोखे खुल जाते हैं और वे उन झरोखों से अपनी बीते हुए दिनों में घूमने निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में हम आप भी उनके सहयात्री बनकर उस गुज़रे जमाने की सैर कर सकते हैं।
   इसी बात को ध्यान में रखकर हम अपने शहर रायपुर को अपने बुज़ुर्गों की यादों के झरोखे से जानने का प्रयास कर रहे हैं । इस महती काम के लिए छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे अपनी यादों को हमारे साथ साझा करने राजी हुए हैं । वे  रायपुर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रहे हैं । एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कोई रायपुर का अकादमिक इतिहास नहीं है ये स्मृतियां हैं । जैसा श्री प्रभाकर चौबे जी ने रायपुर को जिया । एक जिंदा शहर में गुज़रे वो दिन और उन दिनों से जुड़े कुछ लोगघटनाएंभूगोलसमाज व कुछ कुछ राजनीति की यादें ।  और इस तरह गुजश्ता ज़माने की यादगार तस्वीरें जो शायद हमें हमारे अतीत का अहसास कराए और वर्तमान को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सके।
  आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।
जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

        मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा थाखो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

चौथी कक्षा पास कर गाँव से मैं पढ़ने रायपुर भेजा गया पहले धमतरी में पढ़ने की बात सोची गई थी - लेकिन जमी नहीं। अपने मौसेरे भाई के साथ धमतरी से रायपुर आया और मौसी के घर पर रहने लगा लेकिन जल्दी ही मेरा ट्रांसफर कर दिया गया । मतलब मुझे मौसी के घर से एक अन्य रिश्तेदार के घर रहने भेज दिया गया । उनका घर सत्ती बाजार से जो लेन बूढ़ापारा की तरफ मुड़ती है उसी कोने पर था । शहर में उन दिनों के प्रसिद्ध वैद्य बाबूरामजी शर्मा के बाड़े में हमारे रिश्तेदार दो कमरे किराये पर लेकर रहते थे - सरकारी मुलाजिम थे । इसी बाड़े के ऊपर तले में तीन कमरों में मराठी प्रायमरी स्कूल संचालित हो रही थी नाम था जानकी देवी प्राथमिक शाला, जिसकी स्थापना माधव राव सप्रे जी ने की थी ,अब यह स्कूल तात्यापारा वाली सड़क पर चला गया है - यहाँ कुसुमताई दाबके हाई स्कूल की कक्षाएं भी लगती है । सत्ती बाजार के तिगड्डे पर सब्जियाँ वाली भी पसरा लगाकर बैठती थीं । सत्ती बाजार में ही अम्बा देवी मंदिर के एक हिस्से में उन दिनों अखाड़ा भी चलता था । मैं जिन रिश्तेदार के घर रहता था वे तथा मेरे बड़े भाई अखाड़ा जाया करते थे। अम्बादेवी मंदिर भी काफी बड़ी जगह है अंदर वहाँ उन दिनों सावन में सावन का झूला डलता था । हम कुछ मित्र शाम को कभी-कभी यहाँ खेला करते थे । सत्तीबाजार में ही पटेरिया बुक डिपो था । पटेरिया बुक डिपो का अपना खुद का प्रिटिंग प्रेस था - 'कमला प्रेस' के नाम से । कमला प्रेस सत्ती बाजार के पीछे हिन्दू हाई स्कूल के बाजू में था । पटेरिया बुक डिपो के संचालक नंदकिशोर पटेरिया जी ने बच्चों के लिये 'प्पू गम्पू' नाम से बालकथा सिरीज का प्रकाशन शुरु किया था । सत्ती बाजार में कांसे पीतल के बर्तन बनते थे और दूकाने भी थीं । सत्ती बाजार में ही श्री राम बुक डिपो प्रसिद्ध किताब थी, ये दुकान-आज भी है । यहाँ उन दिनों पुरानी पाठय पुस्तकें आधे दाम पर खरीदी जाती थीं। रोड से लगकर डॉ. भालेराव की डिस्पेंसरी (क्लीनिक) थी । उनक पुत्र राजकुमार कॉलेज में प्राचार्य होकर रिटायर हुए । सत्ती चौरा के किनारे जो जगह थी वहाँ चाट का ठेला लगता था - ठेल वाले का नाम रामशरण था । नाम इसलिए याद है कि कभी-कभी मौसी कहती कि जा बेटा रामशरण के ठेले से चाट ले ... पहले महिलाएँ तो ठेले पर खड़ी होकर खाती नहीं थीं । सत्ती बाजार से एक सड़क बूढ़ापारा रोड की ओर मुड़ती थी, उसी से लगकर बाम्बे टेलर्स था, आज भी है। मैंने यहाँ पेंट और कमीज का नाप दिया था । शहर आने पर पहली बार दर्जी से कपड़े सिलवाये थे । उन दिनों विद्यालयों में यूनिफार्म नहीं होता था ।

सत्ती बाजार में शिवर्मशाला में हमारे एक रिश्तेदार के घर आई बारात ठहरी थी - हम बच्चों ने वहाँ खूब काम किया था - नाश्ता देना, पानी देना आदि ।
श्रीराम बुक डिपो के बाजू एक घड़ी सुधारने वाला बैठता - मैं कभी-कभी उसके पाटे पर बैठता वह मुझसे पढ़ाई के बारे में बातें कर लेता - उसने बताया था कि चौथी के बाद उसकी पढ़ाई छुड़ा दी गई और पिता के साथ घड़ी सुधारने के काम में लगा दिया गया । पढ़ाई में उसकी रुचि दिखती थी। सत्ती बाजार रोड पर श्रीराम बुक डिपो के सामने एक बोर्ड टंगा रहता था उस पर लिखा था ला बुक बाइंडर - मैं दुकान की तरफ देखता लेकिन उन दिनों समझ में नहीं आता कि यहाँ होता क्या है । सत्ती बाजार और सदर बाजार के मिलन स्थल पर रोड पर भटिया जी की दुकान थी यह शुद्ध घी के लिए प्रसिद्ध थी ।

1945 में रायपुर में कुछ ही हाईस्कूल थे - गवर्नमेंट हाई स्कूल, लारी स्कूल, बाद में नाम बदलकर सप्रे स्कूल किया गया , सेंटपाल स्कूल तथा हिन्दू सालेम गर्ल्स स्कूल (लड़कियों का स्कूल) और पब्लिक स्कूल आगे और कौन-कौन से स्कूल हाई स्कूल में अपग्रेड हुई थीं वह आगे आता जाएगा । श्री वापट मास्टर साहब का सत्ती बाजार में घर था । वे लारी स्कूल में शिक्षक नियुक्त हुए थे । एक और शिक्षक श्री शीतला चरण दीक्षित (दीक्षित मास्साब के नाम से प्रसिद्ध) वे भी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था  बाद में वे हिन्दू हाई स्कूल में शिक्षक हुए । ए.वी.एम.स्कूल के उस समय के हेडमास्टर ज्ञानसिंह जी अग्निवंशी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वालों में से थे - खादी पहनते थे । शहर छोटा था कुछ ही हाई स्कूल थे इसलिए हेडमास्टर्स तथा शिक्षकों के नाम हर विद्यालय के विद्यार्थियों को मालूम होते - उन दिनों मोहन लाल पांडे जी, आर.पी. श्रीवास्तव जी, संटेपाल स्कूल के हेडमास्टर आर.पी. शर्मा जी,दांडेकरजी, लारी स्कूल के हेड मास्टर इनके नाम पता थे और ज्ञान सिंह जी अग्निवंशी भी शहर में ंजाने जाते थे । शिक्षकों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध पाद्धे मास्टर साहब थे । वे बूढ़ापारा लाखे बाड़ा में रहते थे - गणेश उत्सव में नाटक करते । खुद रोल करते... मिमिकरी बढिया करते । उन दिनों कम ही जगह गणेश बैठते । दुर्गा तो केवल काली बाड़ी में बैठती । काली बाड़ी समिति व स्कूल की स्थापना 1928 में हुई थी । 1945 में कांग्रेस भवन के पीछे एक बाड़ा में कन्या मिडिल स्कूल की स्थापना की गई। बाद में यह स्कूल लाखे स्कूल के सामने स्थित सुपरिनटेन्डेंट लैंड रिकार्ड के आफिस में स्थानांतरित कर दिया गया । शायद स्कूल का सरकारीकरण हो गया था ।
आगे की कड़ी में इस कन्या विद्यालय के सम्बन्ध में नयी जानकारी था बूढ़ा गार्डन पर बात होगी।

जारी....


Sunday, July 30, 2017

रायपुर - स्मृतियों के झरोखे से 1 - प्रभाकर चौबे

    रायपुर शहर एक छोटे से कस्बे से धीरे धीरे आज छत्तीसगढ़ की राजधानी के रूप में लगातार विकसित हो रहा है । इत्तेफाक ये भी है कि इस वर्ष हम अपने नगर की पालिका का 150 वॉ वर्ष भी मना रहे हैं ।
  हमारी पीढ़ी अपने शहर के पुराने दौर के बारे में लगभग अनभिज्ञ से हैं । वो दौर वो ज़माना जानने की उत्सुकता और या कहें नॉस्टेलजिया सा सभी को है । कुछ कुछ इधर उधर पढ़ने को मिल जाता है । सबसे दुखद यह है कि कुछ भी मुकम्मल तौर पर नहीं मिलता । 
        बड़े बुज़ुर्गों की यादों में एक अलग सा सुकून भरा वो कस्बा ए रायपुर  अभी भी जिंदा है । ज़रा सा छेड़ो तो यादों के झरोखे खुल जाते हैं और वे उन झरोखों से अपनी बीते हुए दिनों में घूमने निकल पड़ते हैं। इस यात्रा में हम आप भी उनके सहयात्री बनकर उस गुज़रे जमाने की सैर कर सकते हैं।
   इसी बात को ध्यान में रखकर हम अपने शहर रायपुर को अपने बुज़ुर्गों की यादों के झरोखे से जानने का प्रयास कर रहे हैं । इस महती काम के लिए छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रभाकर चौबे अपनी यादों को हमारे साथ साझा करने राजी हुए हैं । वे  रायपुर से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा कर रहे हैं । इसकी शुरुवात हम आज 31 जुलाई से  करने जा रहे हैं । 
       एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ये कोई रायपुर का अकादमिक इतिहास नहीं है , ये स्मृतियां हैं । जैसा श्री प्रभाकर चौबे जी ने रायपुर को जिया । एक जिंदा शहर में गुज़रे वो दिन और उन दिनों से जुड़े कुछ लोग, घटनाएं, भूगोल, समाज व कुछ कुछ राजनीति की यादें ।  और इस तरह गुजश्ता ज़माने की यादगार तस्वीरें जो शायद हमें हमारे अतीत का अहसास कराए और वर्तमान को बेहतर बनाने में कुछ मदद कर सके।
   आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का भी स्वागत रहेगा।

जीवेश प्रभाकर

अपनी बात

मन हुआ रायपुर पर लिखा जाए - बहुत पहले देशबन्धु का साप्ताहिक संस्करण भोपाल से प्रकाशित हो रहा था तब 12 कड़ियों में रायपुर पर लिखा था, खो गया । पुन: कोशिश कर रहा हूँ - इसमें कुछ छूट रहा हो तो पाठक जोड़ने का काम कर सकते हैं । रायपुर के बारे में  एक जगह जानकारी देने का मन है - अपना रायपुर पहले क्या कैसा रहा ...।   
-प्रभाकर चौबे

रायपुर : स्मृतियों के झरोखे से-1
- प्रभाकर चौबे



सन् 1943 में पहली बार रायपुर आना हुआ मैं तब बच्चा था । सिहावा से बैलगाड़ी में धमतरी आए हम धमतरी से छोटी ट्रेन में बैठकर रायपुर - ट्रेन में बैठने का पहला अवसर था। एक रिश्तेदार के घर शादी में आए थे । बढ़ाई पारा में मौसी के घर ठहरे थे । रायपुर स्टेशन पर माँ ने टाँगा किया था - चार आने में उसने हमें बढ़ाई पारा पहुँचा दिया । आज जहाँ मंजू ममता रेस्ट्रारेंट है वह उन दिनों वहाँ नहीं था - उसी मकान से शादी हुई थी । बाद में वहाँ महाकौशल अखबार का दफ्तर लगने लगा । पहले वह साप्ताहिक अखबार था शायद 1950 में दैनिक किया गया । शादी निपटने के बाद एक दिन अपने मौसेरे भाई के साथ जो मुझसे काफी बड़े थे, रायपुर घूमने निकला - आज भी याद है । जहाँ आज जयराम कॉम्पलेक्स है वहाँ शारदा टाकीज थी और सड़क किनारे में दुकानों से लगाकर सीमेंट का फुटपाथ बना था जो आगे चौराहे तक जाता था तब यह चौराहा जयस्तम्भ नहीं कहलाता था, 15 अगस्त 1947 से यह जयस्तम्भ चौक कहलाने लगा । इसी चौराहे के दूसरे छोर पर जहाँ आज गिरनार होटल है उस भवन में पब्लिक स्कूल था । चौराहे के उस छोर पर इम्पीरियल बैंक का भवन - उसके ऊपर अंग्रेजों का झंडा फहरा रहा था । दूसरी तरफ सीमेंट का फुटपाथ बना था जो आगे पोस्ट ऑफिस तक जाता था । इस फुटपाथ पर कटिंग करने वाले अपने डिब्बा लेकर बैठते दाढ़ी का एक आना और कटिंग का दो आना रेट था । कुछ फोटोग्रार भी अपना सामान लेकर यहाँ खड़े होते इसी से लगकर एक भवन था जिसमें कलकत्ता बैंक लगता था - मेरे मौसेरे भाई ने कहा था - यह है कलकत्ता बैंक । आगे दाहिनी ओर बेंसली रोड ( आज का मालवीय रोड) पर पोस्ट ऑफिस और पोस्ट आफिस से पहले सुपरिनटेंडेंट रेलवे पुलिस का दफ्तर और उसी भवन में डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर का ऑफिस लगता था । दाहनी ओर पालिका का भवन था । पालिका भवन से पहले एक बड़ा-सा भव्य गेट था - उस पर लिखा था केसर-ए- हिन्द दरवाजा ।
बेंसलीरोड में आगे बढ़ते चले जाने पर दाहिनी ओर डायमंड होटल था - काफी प्रसिद्ध। उसके मालिक थे बेचर भाई - फुटबाल मैच देखने के शौकीन - यह जानकारी मौसेरे भाई ने चलते हुए दी थी । उससे पहले ही बाबूलाल टाकीज थी । डायमंड होटल से लगकर एक बड़ा पीपल का दरख्त था - वैसे पूरे बंसली रोड में जगह जगह पीपल के पेड़ थे । सी बेंसली रोड पर डायमंड होटल के  सामने फ्रुट मार्केट था और फिलिप्स मार्केट   जिसे आज जवाहर बाज़ार के नाम से जाना जाता है। दरअसल वो जवाहिर मार्केट है जिसके बारे में आगे चर्चा करेंगे । आगे चौक पड़ता । चौक के बाई ओर कोने पर हबीब होटल था और दूसरी तरफ दाएं बाजू दूसरे कोने पर भांजीभाई की दुकान थी । उसी से लगे झाड़ की छाया में पसरा लिए कुछ फल बेचने वाली बैठती थी । भांजीभाई से लगकर एक इतर की दुकान थी आगे हनुमान जी मढ़िया थी - पीपल झाड़ के नीचे । बेंसली रोड के अंदर बाजू प्रसिद्ध गोल बाजार था । बेंसली रोड पर ही बाई ओर बाटा की दुकान थी और सामने कीका भाई की दुकान थी । आगे गोल्डन हाउस था । कोतवाली चौरहो से दाहिनी तरफ मुड़ने पर सदर में घुसते पर हम सड़क की तरफ बढ़े । मौसेरे भाई ने कहा कोतवाली से आगे देखने लायक कुछ है नहीं । मौसरे भाई ने फूल चौक पर चलते ही बताया - ये यादव न्यूज एजेंसी है। नागपुर से निकलने वाले अखबार शाम को यहाँ पहुँचते हैं इसी फूल चौक पर डॉ.टी.एम. दाबके का दवाखाना था । आगे जो एक गली जोरापार को निकलती है उस मोड़ पर दुर्ग जाने वाली बसों का बस अड्डा था - कोयले के भॉप से बसे चलती थीं ।
फूल चौक से तात्यापारा चौक की तरफ बढ़ने पर नगरपालिका के दो प्राथमिक स्कूल थे एक उर्दू प्राथमिक स्कूल और दूसरा हिन्दी प्राथमिक स्कूल यहाँ आज नवीन मार्केट है । आगे मिशन पुत्रीशाला थी । इस पुत्री शाला में पढ़ाने वाली शिक्षिका मिसेज फ्रांसिस जो सालेम गर्ल्स हाई स्कूल की प्राचार्य बनी ...
जारी''




Wednesday, July 19, 2017

बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा...


      कुछ इसी तर्ज़ पर चलाया जा रहा है मोदी व भाजपा के एजेण्डे का प्रचार प्रसार.. ...एक बात तो माननी होगी कि मोदी केप्रचार तंत्र में संलग्न प्रोफेशनल्स अपनी पूरी प्रतिभा पूरे देश को मोदीमय करने में लगा रहे हैं और काफी हद तक कामयाब हो रहे हैं......मीडिया तो अपने व्यवसायिक लाभ के चलते इस प्रचार तंत्र का भागीदार है ही मगर देश का बौद्धिक वर्ग भी इस मकड़जाल की गिरफ्त में फंसता जा रहा है.... एक एक शब्द ..एक एक कदम बहुत सोचा समझा और सुनियोजित सा है...पूरी पटकथा जबरदस्त पूर्वानुमान के साथ लिखी जाती है जिससे पूरे देश में मोदी के पक्ष या विपक्ष दोनो में चर्चा का माहौल पैदा हो....

हम आप भी इस जाल से बच नहीं सकते क्योंकि बयानो और हरकतों से आपको इस हद तक विचलित कर दिया जाता है कि आप प्रतिक्रिया से दूर नहीं भाग सकते....इस तरह हम चाहे अनचाहे इस प्रचार का हिस्सा होते चले जा रहे हैं.....
मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम इस अभियान को नजरअंदाज करना शुरु कर दें तो निश्चित रूप से मोदी के प्रचार खेमे में बेचैनी फैलेगी क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य गंभीर बहस की बजाय सनसनी फैलाना ही है....अतः अबसे आगे मोदी की चर्चा पर कुछ विराम लगाकर देखा जाए....विपक्षी दलों में कॉंग्रेस से ऐसी उम्मीद बेमानी है ...क्योंकि कॉंग्रेस तो हाल के दौर में बौद्धिक दिवालिएपन के संक्रमण से गुजर रही है....नितीश कुमार की कलई उतर चुकी है....लालू खुद प्रश्नों के घेरे में हैं....आप की विश्वासनीयता संदिग्ध हो चुकी है और...वाम तो हाशिए पर ही है .... 

आप बौद्धिक लोगों के साथ यह प्रयोग करके देखना चाहता हूं....अापका क्या ख्याल है ?हम आप भी इस जाल से बच नहीं सकते क्योंकि बयानो और हरकतों से आपको इस हद तक विचलित कर दिया जाता है कि आप प्रतिक्रिया से दूर नहीं भाग सकते....इस तरह हम चाहे अनचाहे इस प्रचार का हिस्सा होते चले जा रहे हैं.....मुझे ऐसा लगता है कि यदि हम इस अभियान को नजरअंदाज करना शुरु कर दें तो निश्चित रूप से मोदी के प्रचार खेमे में बेचैनी फैलेगी क्योंकि उनका एकमात्र उद्देश्य गंभीर बहस की बजाय सनसनी फैलाना ही है....अतः अबसे आगे मोदी की चर्चा पर कुछ विराम लगाकर देखा जाए....विपक्षी दलों में कॉंग्रेस से ऐसी उम्मीद बेमानी है ...क्योंकि कॉंग्रेस तो हाल के दौर में बौद्धिक दिवालिएपन के संक्रमण से गुजर रही है....नितीश कुमार की कलई उतर चुकी है....लालू खुद प्रश्नों के घेरे में हैं....आप की विश्वासनीयता संदिग्ध हो चुकी है और...वाम तो हाशिए पर ही है .... आप बौद्धिक लोगों के साथ यह प्रयोग करके देखना चाहता हूं....अापका क्या ख्याल है ?

Monday, June 19, 2017

मुक्तिबोध ः पत्रकारिता के प्रगतिशील प्रतिमान -जीवेश प्रभाकर

गजानन माधव मुक्तिबोध का यह जन्म शताब्दी वर्ष है । पिछली आधी सदी
से हिन्दी साहित्य मे मुक्तिबोध की गंभीर उपस्थिति एक  गहन बौद्धिक आवरण की तरह छाई हुई है । मुक्तिबोध एक चिंतनशील व जागरूक रचनाधर्मी के रूप में जाने जाते हैं । वे  गहन मानवीय संवेदना के कवि तथा कल्पनाशील कथाकार तो हैं ही साथ ही स्पष्टवादी समीक्षक के रूप में भी जाने जाते हैं । कविता कहानी व समीक्षा के अलावा इतिहास व अन्य विषयों पर भी उनका प्रचुर लेखन रहा है । एक बात जो उनके संदर्भ में ज्यादा प्रकाश में नहीं लाई जाती वो है उनका पत्रकार के रूप में लिखा गया महत्वपूर्ण गद्य । हालांकि मुक्तिबोध ने अपनी दीगर रचनाओं के मुकाबले अखबारी लेखन कम ही किया है मगर एक छोटे अंतराल में ही सही उन्होंने अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाते हुए जो लिखा वो उन्हें बेबाक, अध्ययनशील व जागरूक पत्रकार के रूप में स्थापिक करता है साथ ही उच्चस्तरीय पत्रकारिता की एक मिसाल कायम करता है जिसे आज भी छू पाना बहुत मुश्किल है। इस तरह साहित्य व पत्रकारिता दोनो के शीर्ष प्रतिमानो का एक साथ मिल पाना दुर्लभ संयोग ही कहा जा सकता है । यह बात गौर तलब है कि जो मुक्तिबोध अपनी रचनाओं में दुरूह  व क्लिष्ट समझे जाते हैं वही अखबारों में बहुत ही सीधी व सरल  भाषा में अपनी बात कहते हैं जो आसानी से संप्रेषित होती है । अक्सर बुद्धिजीवी उनके साहित्यिक गूढ़ता के आलोक में उनकी इस सीधी सरल भाषा एवं जानकारीपूर्ण  व तथ्यात्मक आलेखों को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं । ‘’मुक्तिबोध रचनावली’’ के छठे खंड  में  मुक्तिबोध के अखबारी लेखन को शामिल किया गया है । इसके अलावा उनके पुत्र  रमेश मुक्तिबोध ने अपने पिता की सामग्री खोज कर  उसे ‘’जब प्रश्नचिन्ह बौखला उठे’’ शीर्षक से ‘’रचनावली’’ काफी वर्षों बाद एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में  प्रकाशित करवाया है ।
मुक्तिबोध की पत्रकारिता आज़ादी के बाद और मुख्य रूप से पहले आम चुनाव 1952 के आसपास ही शुरू होती है । इसके पूर्व वे एक पत्रकार के रूप मे कम ही सक्रिय रहे। मुक्तिबोध नया खूनके सम्पादक रहे इसके अलावा  वे नागपुर से ही प्रकाशित सारथीके साथ भी जुड़े रहे । माना जाता है कि मुक्तिबोध ने छद्म नामो से भी अनेक लेख लिखे । आजादी के पश्चात देश अनेक कठिनाइयों से गुज़र रहा था । एक ओर विभाजन की त्रासदी थी तो दूसरी ओर देश आर्थिक मोर्चे पर भी अनेक कठिनाइयों से जूझ रहा था । ऐसी परिस्थितियों के बावजूद नव स्वतंत्र देश के स्वप्न भी आकांक्षाओं के पंख फैलाए नए फलक पर छा जाने को आतुर थे । राष्ट्रीय नेताओं में तब सबसे युवा, लोकप्रिय व ऊर्जावान नेता पं. जवाहर लाल नेहरू देश की बागडोर संभाल चुके थे । आजादी की मध्य रात्रि को दिए गए उनके ओजस्वी भाषण से देश में एक नई ऊर्जा व उत्साह का संचार हुआ, विशेष रूप से युवाओं को पं. नेहरू से काफी उम्मीदें जगी थीं । देश के युवा वर्ग में पं. नेहरू के करिश्माई व्यक्तितव का जादू चरम पर था और इससे मुक्तिबोध भी अछूते नहीं रह पाए थे । संभवतः पं. नेहरू के समाजवादी रुझान एवं नास्तिकता की हद तक धर्मनिरपेक्ष रुख प्रमुख कारण रहा हो , यहां तक कि पं. नेहरू की मुत्यु पर तो मुक्तिबोध ने स्पष्ट रूप से यह घोषित कर दिया था कि अब फासिज्म को देश में पैर पसारने से कोई रोक नहीं सकता और आज हम उनकी आशंकाओं को फलीभूत होते देख ही रहे हैं । यह बात भी गौरतलब है कि नेहरू के अवसान, 27 मई 1964, के बमुश्किल 6 महीने के अंतराल में, 13 सितंबर 1964, मुक्तिबोध का भी निधन हो गया।
 अपने अखबारी लेखन के छोटे मगर महत्वपूर्ण कालखंड में मुक्तिबोध नवस्वतंत्र भारत के पुनर्रुत्थान में  नेहरू की भूमिका को लेकर काफी उत्साहित व आशान्वित थे ऐसा उनके लेखों में साफ झलकता है । पं. नेहरू के नेतृत्व में आजाद भारत के विकास को लेकर भी मुक्तिबोध को पं. नेहरू से काफी आशाएं थी । हालांकि  आज़ादी के कुछ वर्षों बाद ही पूरे देश में स्वप्नभंग व निराशा का दौर शुरु हो चुका था, जो  मुक्तिबोध की दीगर रचनाओं में भी झलकने लगा था, मगर एसके बावजूद उनके मन के एक कोने में नेहरू के प्रति अंत तक एक नरम व आशावादी रुख बना रहा। दून घाटी में नेहरू, नेहरू की जर्मन यात्रा का महत्व, तटत्थ देशों को ज़बरदस्त मौका, जैसे लेखों में मुक्तिबोध की पं. नेहरू के प्रति आसक्ति को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है । उनका लेखन मुख्यतः नेहरू-युग के उतार चढ़ाव के दौर में विश्व-राजनीति में भारत की भूमिका ,तटस्थ देशों एवं साम्यवादी देशों की भूमिका, अमेरिकी-सोवियत शीत-युद्ध और इन सब के बीच नव-स्वतंत्र भारत की विकासशील छवि को लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्थिति एवं इसमें पं. नेहरू की सूझबूझ भरी दूरदृष्टि पर केन्द्रित  कही जा सकती है । इन लेखों में मुक्तिबोध के साम्यवादी प्रगतिशील विचारों की स्पष्टता एक महत्वपूर्ण पहलू है जिसे आज भी पढ़ा जाना चाहिए ।  
अंतर्राष्ट्रीय  हालात और संबंधों की जो समझ मुक्तिबोध में तब थी आज भी वैसी समझ व दृष्टिकोण  का कोई पत्रकार नज़र नहीं आता है । प्रगतिशील साहित्यकारों में भी इस तरह साहित्य से इतर मसलों व परिस्थितियों पर जागरुकता का घोर अभाव रहा है । आजादी के पश्चात प्रगतिशील रचनाकारों में  मुक्तिबोध के अलावा हरिशंकर परसाई ऐसे रचनाकार रहे जिन्होने मुक्तिबोध की तरह स्वतंत्र भारत की परिस्थितियों का गहन अधययन मनन कर लगातार लेखन किया । यह बात गौरतलब है कि जहां मुक्तिबोध तमाम विषयों पर गंभीर लेखन करते रहे वहीं परसाई ने व्यंग्य के माध्यम से लगभग आधी सदी तक  लोक शिक्षण का काम किया मगर दोनो के ही लेखन में प्रचुर अध्ययन, सूक्ष्म अवलोकन व स्पष्ट रूप से साम्यवादी प्रगतिशील मानवीय दृष्टिकोण समान रूप से मौजूद रहा है । इस संदर्भ में एक बात और गौर करने लायक है कि जहां परसाई प्रारंभ से ही नेहरू की नीतियों की निष्पक्ष समीक्षा धरातल पर आकर करते रहे वहीं मुक्तिबोध की नेहरू के प्रति आसक्ति को उनके लेखन से समझा जा सकता है ।
एक पत्रकार के रूप में उन्होने राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों एवं तात्कालीन वैश्विक परिदृष्य पर पूरे अध्ययन व गंभीर चिंतन के साथ तर्कपूर्ण आलेख लिखे । इससे उनकी वैश्विक समझ व प्रगतिशील दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है । छठवें दशक में वे एक सजग व जागरूक पत्रकार के रूप में न सिर्फ देश के अंदरूनी हालातों पर वरन यूरोप व अमेरिका सहित पूरे विश्व से संबंधित समस्त मसलों पर अपने आलेखों के माध्यम से वे लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे । यह बात ग़ौरतलब है कि आज एक बार फिर यूरोप व अमरीका जबरदस्त अंतर्विरोध व संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और दश्रिणपंथी ताकतें फिर सर उठा रही हैं मगर कम से कम हमारे देश के अखबारों या मीडिया में इसे लेकर महज सूचनाओं के और  कोई गंभीर आलेख पढ़ने को नहीं मिल रहे हैं । हाल में संपन्न फ्रांस के चुनावों पर पूरे विश्व की निगाहें थी । गौरतलब है कि लगभग साठ वर्ष पूर्व फ्रांस किस ओर आलेख में मुक्तिबोध ने द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात फ्रांस के बहाने पूरे यूरोप की तत्कालीन परिस्थितियों पर अमरीकी पूंजी निवेश के दुष्परिणामों का उल्लेख करते हुए भविष्य के खतरों की ओर इशारा किया था । आज ऐसे विश्लेषणात्मक लेख का सख्त अभाव पूरे प्रकारिता जगत में देखा जा सकता है । लगभग 60 वर्ष पूर्व वे विश्व में तेजी से बढ़ती अमरीका के दखल व पूंजीवादी ताकतों के साम्राज्यवादी मंसूबों पर वे लगातार सचेत होकर लिखते रहे । अंग्रेज गए मगर इतनी अंग्रेजी पूंजी क्यों, समाजवादी समाज या अमरीकी ब्रिटिश पूंजी की बाढ़, तथा अन्य लेखों में वैश्विक स्तर पर बढ़ते पूंजीवादी खतरों व अमरीकी प्रभाव के प्रति लगातार इशारा करते रहे ।
 हालांकि मुक्तिबोध कभी राजनैतिक एक्टिविस्ट नहीं रहे और न किसी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग ही लिया मगर मुक्तिबोध के पास एक गहरी राजनैतिक व सामाजिक दृष्टि के साथ ही आर्थिक मामलों की समझ, सूक्ष्म व चौकस अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि तथा गहन व विस्तृत अध्ययन था। ऐसा विलक्षण संयोग आज भी मिल पाना कठिन है । उन्होने दिग्विजय कॉलेज के कार्यकाल के दौरान एक आयोजन में अपने उद्बोधन में कहा था कि कोई भी घटना क्यों घटती है पत्रकार को उसके मूल कारणों को समझना जरूरी है, आधुनिक राजनीति में जनमत का महत्वपूर्ण है तथा जनमत के मूलाधार के बिना किसी भी देश में न तानाशाही कायम रह सकती है न लोकतंत्र ।  एक बात स्पष्ट तौर पर कही जा सकती है कि मुक्तिबोध साम्यवाद के प्रति पूरी तरह समर्पित थे । देश व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर  साम्यवाद व साम्यवादी देशों की मुश्किलों के प्रति उनकी चिंता उनके अनेक लेखों में देखी जा सकती है । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूंजी व पूंजीवादी देश अमरीका के बढ़ते प्रभाव तथा तत्कालीन साम्यवादी ताकतवर देश सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध के वैश्विक परिणामों व हलचलों पर वे पैनी दृष्टि रखते थे । पश्चिम एशिया में अमरीका की दिलचस्पी, साम्यवादी राष्ट्रों की नई समस्या, साम्यवादी समाज या अमरीका, कम्युनिज्म का संक्रमणकाल,समाजवाद का निर्माण जैसे आलेखों के माध्यम से वे लगातार अपनी चिंता जाहिर करते रहे ।
राजनैतिक लेखों के अलावा मुक्तिबोध सामाजिक व सांस्कृतिक फलक पर भी लगातार सक्रिय रहे । वे देश की सांस्कृतिक विरासत के  सजग प्रहरी के रूप में संस्कृति पर बढ़ते फासिस्ट खतरों से अनजान नहीं थे बल्कि लगातार उस पर लिख रहे थे । सांस्कृतिक आध्यात्मिक जीवन पर संकट, दीपमलिका,हुएनसांग की डायरी,भारतीय जीवन के कुछ विशेष पहलू आदि लेख आज भी अपनी उपयोगिता पर खरे उतरते हैं । संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन के दौरान उनके द्वारा लिखित संयुक्त महाराष्ट्र का निर्माण एकदम ज़रूरी’’  सम्पादकीय में मुक्तिबोध स्वायत्त महाराष्ट्र राज्य की  पैरवी करते हैं और इसे एक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दस्तावेज़ बना देते  हैं । वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हैं कि महाराष्ट्र प्रांत के लिए आन्दोलन अलगाववादी नहीं  बल्कि वह भारतीय संस्कृति और महत्वाकांक्षा का ही एक वेगवान रूप है । अपने संपादकीय में वे एकीकृत संयुक्त महाराष्ट्र के पक्ष में आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि सभी पहलू शामिल करते हैं । इस तरह के संपादकीय की कल्पना आज कर पाना संभव नहीं है और पूर्व में भी कहीं नजर में नहीं आता है । इसके साथ साथ वे आधुनिक भारतीय समाज, युवा वर्ग, धर्म अवं अन्य संसामयिक विषयों पर भी लगातार अपने विचार व्यक्त करते रहे । आधुनिक समाज का धर्म, भारतीय जीवन के कुछ विशेष पहलू,नौजवान का रास्ता,ज़िन्दगी के नए तकाजे और सामाजिक त्यौहार जैसे आलेखों में उनकी चिंताओं पर उनके प्रगतिशील विचारों को समझा जा सकता है । भाषा को लेकर वे अत्यंत संवेदनशील थे ये उनकी हर रचना में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, मगर हिन्दी के सरकारीकरण की विडंबनाओं पर उनका लेख अंग्रेजी जूते में हिन्दी को फिट करने वाले भाषाई रहनुमा बहुत महत्वपूर्ण व व्यवहारिक है ।
अपने रचनाकाल के छोटे कालखंड में मुक्तिबोध द्वारा की गई पत्रकारिता के दौरान अखबारों में किए गए लेखन को बाद में लगातार हाशिए पर ही रखा गया । इसका एक कारण संभवतः ये हो सकता है कि मुक्तिबोध का सारा लेखन  उनकी मृत्यु पश्चात ही प्रकाशित हो पाया और उन्हें मृत्यु पश्चात ही ज्यादा लोकप्रियता मिली। उस दौर में ग़ैरसाहित्यिक लेखन को हल्का, निम्नस्तरीय समझा जाता रहा और अखबारी लेखन कहकर उपहास भी उड़ाया जाता रहा । इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि साहित्य जगत में उनकी कविताओं व गद्य पर ही सारा ध्यान केन्द्रित कर दिया गया,हालांकि बदलते परिवेश में आज सभी अखबार व अन्य मीडिया की ताकत के सामने नतमस्तक हैं और इनमें छपने लालायित रहते हैं । मुक्तिबोध के अनुसार बहुत से कवियों के अन्तःकरण में जो बेचैनी , जो ग्लानि, जो अवसाद, जो विरक्ति है, उसका एक कारण उनमें एक ऐसी विश्व दृष्टि का अभाव है जो उन्हें आभ्यन्तर आत्मिक शक्ति प्रदान कर सके, उन्हें मनोबल दे सके, और उनकी पीड़ाग्रस्त अगतिकता को दूर कर सके । कवियों से ऐसी विश्वदृष्टि अपेक्षित है जो भावदृष्टि का, भावना का, भावात्मक जीवन का अनुशासन कर सके ...। आज उनकी इस बात पर गौर करना ज़रूरी है । रचनाकारों को , विशेष रूप से प्रगतिशील जनवादी रचनाकारों को, इस ओर ध्यान देना चाहिए । मुक्तिबोध के अखबारी लेखन के प्रचार प्रसार एवं  पुनर्पाठ की सख़्त ज़रूरत है । उनके अखबारी लेखन में भी उनकी विचारधारा कहीं समझौते नहीं करती बल्कि पत्रकारिता को नए आयाम देती है और पत्रकारिता के प्रगतिशील प्रतिमान स्थापित करती है । मुक्तिबोध की सुप्रसिद्ध कविता अंधेरे में के अंश  है-
इसलिए मैं हर गली मे
और हर सड़क पर
झांक झांक देखता हूं हर एक चेहरा
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र
व हर एक आत्मा  का इतिहास
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया क्रियागत परिणति
खोजता हूं पठार...पहाड़...समुंदर
जहां मिल सके मुझे
मेरी वह खोई हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म- संभव ।

-जीवेश प्रभाकर-
कथाकार एवं उप-संपादक अकार
Mob,- 9425506574

Email: jeeveshprabhakar@gmail.com