
हार के पश्चात कॉग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने
इस्तीफा दे दिया और कॉंग्रेस में नेतृत्वशून्यता का दौर अब तक जारी है । निश्चित
रूप से जीत या हार की नैतिक जिम्मेदारी अध्यक्ष की ही होती है । जहां एक ओर भाजपा
अध्यक्ष अमित शाह को जीत का श्रेय मिला तो कॉंग्रेस में हार की जिम्मेदारी भी
अध्यक्ष पर ही होगी । राहुल गांधी की बहादुरी या कहें नैतिक साहस की तारीफ तो करनी
ही होगी कि उन्होंने हार की जिम्मेदारी स्वीकारी और पद से इस्तीफा दिया । यह शायद
आजादी के बाद कॉग्रेस के इतिहास में पहली बार है जब गांधी परिवार से संबंधित किसी
व्यक्ति ने हार की जिम्मेदारी स्वीकारते हुए इस्तीफा दिया है । अब तक हार के बाद न
तो कॉंग्रेस में न तो कभी इस्तीफा दिया जाता रहा और न किसी की अपने पार्टी अध्यक्ष
से इस्तीफा मांगने की हिम्मत ही होती थी । आज राहुल के इस्तीफे को भी महीने भर से
ज्यादा हो चुका है मगर कॉंग्रेस में कोई नवाचार की आहट सुनाई नहीं दे रही है ।
सुविधाभोगी कॉंग्रेसी अपने वातानुकूलित ऐशगाहों में पड़े हुए राहुल गांधी को मनाने
में लगे है । राजीव गांधी की हत्या के पश्चात भी जब सोनिया गांधी ने सक्रिय
राजनीति से अपने व अपने परिवार को दूर कर लिया था तब भी कॉंग्रेस में लगभग ऐसी ही
स्थिति बन पड़ी थी । फर्क ये था कि तब कॉंग्रेस के पास बहुमत आ चुका था
परिणामस्वरूप किसी ने कोई ज्यादा हल्ला नहीं मचाया और 5 साल आराम से सरकार चलाई ।
इस बीच कॉंग्रेस अध्यक्ष भी गांधी परिवार का नहीं रहा । मगर कॉंग्रेस अगले चुनाव
में अपनी साख नहीं बचा पाई और चुनाव हार गई । चुनाव हारते ही फिर कॉंग्रेस को
गांधी परिवार की याद आई और बहुत प्रयासों के पश्चात सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनने
राजी कर लिया गया जिन्होने ठंडी शुरुवात के पश्चात 2004 में कॉंग्रेस को वापस
सत्ता में लाने में कामयाबी हासिल की और 10 साल तक केन्द्र में गांधी परिवार के
नेतृत्व बिना कॉंग्रेस की सरकार चलाई ।
कॉंग्रेस की हार से कॉंग्रेस को तो बड़ा झटका
लगा ही साथ ही धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील वर्ग भी सदमें में आ गया । फासीवाद और
सांप्रदायिकता के खिलाफ खामोश लड़ाई में सक्रिय व विकल्प के रूप में कॉंग्रेस और
विशेष रूप से राहुल गांधी से उम्मीदे लगाए इस वर्ग को चुनावी नतीजे ने यह सोचने पर
मजबूर कर दिया है कि क्या आज की जनता को कबीर नहीं कबीर सिंह चाहिए , देवदास नहीं देव डी
पसंद है ? क्या 21 वीं सदी में पिछली सदी के औजारों से नहीं
लड़ाई जारी रख सकते हैं ? निश्चित रूप से आज बदलते परिवेश में जन्मती नई चुनौतियों से निपटने नए औजार और उपकरण चाहिए , मगर हर दौर में जनता तक पहुंचने के लिए आभासी
दुनिया से निकलकर सशरीर जनता के बीच ही जाना होगा । सोशल मीडिया के भरोसे आप सोसायटी की लड़ाई
नहीं जीत सकते ।
भाजपा के लिए यह भूमिका राष्ट्रीय स्वयं सेवक
संघ निभा रहा है । इस बात को स्वीकारना ही होगा कि आज संघ ने समाज के हर तबके में अपनी पैठ बना ली है
। ये तल्ख हकीकत है किसी को हजम हो न हो । संघ
व भाजपा से हर तरह के वैचारिक मतभेदों के बावजूद लक्ष्य प्रप्ति के लिए समाज व
लोगों के बीच संघ की निरंतर सक्रिय बने
रहने की रणनीति की सफलता से इंकार नहीं
किया जा सकता । वैचारिक संघर्ष में पार्टी गौण हो जाती है इस बात को समझना होगा । अपनी इसी रणनीति के चलते तमाम विपरीत परिस्थितियों एवं अपनी मूल पार्टी जनसंघ की बलि चढ़ाने के बाद संघ पोषित नई पार्टी भाजपा अन्ततः सत्ता हासिल
करने में कामयाब हुई । । इस सफलता के लिए हालांकि 50 साल लग गए । इस
उपलब्धि में अटल बिहारी बाजपेयी की अनवरत मेहनत व संघर्ष किसी भी राजनैतिक कार्यकर्ता के लिए एक आदर्श
हो सकता है । दूसरी ओर कॉंग्रेस का सेवादल जो पहले आम जन को
कॉंग्रेस से जोड़े रखता था आज बदतर हालत में है , कोई नामलेवा तक नहीं बचा है ।
गांव गांव तक फैले सेवादल के कार्यकर्ता जनता व कॉंग्रेस के बीच एक पुल का काम
करते थे , एक तरह से यही कॉंग्रेस का जमीनी कैडर था जिससे कॉंग्रेस जनता की
मनःस्थिति और मंशा से पूरी तरह अपडेट रहा करती थी । आजादी के बाद सत्ता की राजनीति
के चलते कॉंग्रेस ने इस निचले स्तर के कैडर को पूरी तरह अनदेखा वउपेक्षित कर
अन्ततः खत्म सा ही कर दिया । यहां यह बात भी याद रखनी होगी कि संघ के संस्थापक हेड्गेवार
कॉंग्रेस सेवादल से जुड़े हुए थे । उसी तर्ज पर उन्होंने संघ की बुनियाद रखी और आज
यही भाजपा के लिए एक सशक्त जमीनी कैडर बनकर सत्ता की राह मजबूत कर रहा है साथ ही
पार्टी के माध्यम से अपनी नीतियों को समाज में अपने तरीके से स्वीकार कराने में
महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है ।
सवाल ये है कि क्या राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने
से पार्टी के फिर से मजबूत
होने में मदद मिल सकती है । पार्टी
के प्रमुख की निराशा पूरी पार्टी के मनोबल को प्रभावित करती है । यह बात भी गौरतलब
है कि नेतृत्व की गैर मौजूदगी में संकट का
सामना कर रही है कांग्रेस
पार्टी के लिए ऐसी स्थिति ठीक नहीं है क्योंकि कुछ महीने बाद ही तीन राज्यों में विधानसभा चुनावों का सामना करना है । यह मानना भी उचित नहीं है कि अगर परिवार से बाहर कोई अध्यक्ष बनेगा तो
पार्टी खत्म हो जाएगी । उनके इस्तीफे से शायद पार्टी को नया स्वरूप मिलने में मदद मिले । वर्तमान परिस्तियों में हालांकि इसके लिए जरूरी है कि राहुल गांधी पार्टी में सक्रिय रहें और
पार्टी के नेता एवं कार्यकर्ता नए अध्यक्ष को स्वीकार करें। इसके लिए राहुल गांधी को पलायन की बजाय पार्टी में सक्रिय रहना होगा , कॉंग्रेस
के अपने कैडर या कहें अपने सेवादल को पुनः
मजबूत व महत्वपूर्ण बनाना होगा । राहुल गांधी इस दिशा में काम करें तो संभव है कि जनता में उनकी एक नई छवि बने और भविष्य में अपने
कैचरों के बल पर ही उनकी लोकप्रियता जनस्वीकार्यता में तब्दील हो सके ।
इसके साथ ही इन परिस्थितियों में राहुल गांधी
को अपनी दादी स्व इंदिरा गांधी की जुझारू प्रवृत्ति को आत्मसात करना होगा। उन्हें
याद करना होगा कि 1977 की हार के पश्चात इंदिरा जी बजाय निराश होने के दोगुनी ताकत
से जनता के बीच गईं और अपनी खोई साख व सत्ता वापस हासिल करने में जबरदस्त रूप से
कामयाब रहीं । अपने इस्तीफे में खुद राहुल गांधी ने कहा है कि
लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कांग्रेस पार्टी को खुद को मौलिक रूप से बदलना होगा, भारत कभी भी एक आवाज नहीं रहा है यह हमेशा आवाजों का एक समूह रहा है यही भारत का
सच्चा सार है।
राहुल की यह सोच सकारात्मक तो है मगर इसे सिद्धांत व विचार को व्यवहार में धरातल
पर भी लाना होगा तभी कॉंग्रेस जनता का विस्वास व समर्थन वापस पासिल कर पाने में
कामयाब हो सकेगी ।
जीवेश
चौबे
( देशबन्धु ,17 जुलाई 2019 को प्रकाशित)